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    किचन में चूल्हा और सिंक एक ही स्लैब पर हैं? जानिए वास्तु के अनुसार इसके नुकसान और बिना तोड़फोड़ ऐसे करें वास्तु बैलेंस

    घर की किचन सिर्फ खाना बनाने की जगह नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार की सेहत, रिश्तों और खुशहाली से जुड़ी मानी जाती है. यही वजह है कि लोग किचन बनवाते समय उसकी दिशा, लेआउट और सामान की जगह को लेकर काफी सजग रहते हैं, लेकिन हर किसी को अपनी पसंद से किचन डिजाइन कराने का मौका नहीं मिलता, खासकर तब जब घर किराए का हो या पहले से बना हुआ हो. ऐसे में अक्सर एक आम समस्या देखने को मिलती है-चूल्हा और सिंक का एक ही स्लैब पर होना. दिखने में यह सामान्य लगता है, पर वास्तु के नजरिए से इसे सही नहीं माना जाता. माना जाता है कि इससे घर में तनाव, खर्च बढ़ना और छोटी-छोटी परेशानियां बनी रह सकती हैं.

    अच्छी बात यह है कि अगर आपकी किचन में भी ऐसा सेटअप है, तो बिना तोड़फोड़ किए कुछ आसान बदलावों से इसका असर कम किया जा सकता है. आइए समझते हैं कि चूल्हा और सिंक साथ होने से क्या दिक्कत मानी जाती है और इसे कैसे संतुलित किया जा सकता है. इस बारे में बता रहे हैं
    चूल्हा और सिंक एक साथ क्यों नहीं माने जाते ठीक
    वास्तु में किचन को ऊर्जा का केंद्र माना जाता है. चूल्हा आग का प्रतीक है, जबकि सिंक पानी का. जब ये दोनों बहुत पास या एक ही स्लैब पर होते हैं, तो आग और पानी की विपरीत प्रकृति टकराती है. यही टकराव घर के माहौल में असंतुलन से जोड़ा जाता है. मान्यता है कि इससे घर के सदस्यों के बीच बेवजह बहस, कामों में रुकावट और खर्च बढ़ने जैसी स्थितियां बन सकती हैं. साथ ही किचन में काम करने वाले व्यक्ति को भी बेचैनी या थकान ज्यादा महसूस हो सकती है. इसलिए आदर्श स्थिति में चूल्हा और सिंक अलग दिशा और अलग सतह पर होना बेहतर माना जाता है.

    अगर जगह बदलना संभव न हो तो क्या करें
    अक्सर किचन का ढांचा ऐसा होता है कि चूल्हा या सिंक की जगह बदलना आसान नहीं होता. खासकर फ्लैट या किराए के घर में तो बदलाव करना लगभग नामुमकिन होता है. ऐसे में कुछ छोटे-छोटे उपाय अपनाकर इस असंतुलन को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
    लकड़ी का छोटा पार्टिशन रखें
    चूल्हा और सिंक के बीच लकड़ी का छोटा बोर्ड या पार्टिशन रखना सबसे आसान और असरदार उपाय माना जाता है. लकड़ी को संतुलन का माध्यम माना जाता है, जो आग और पानी के बीच दूरी का भाव पैदा करती है. यह पार्टिशन बड़ा या भारी होने की जरूरत नहीं. बस इतना हो कि दोनों के बीच अलगाव दिखे. इससे ऊर्जा का सीधा टकराव कम माना जाता है.

    बीच में हरा पौधा रखें
    हरा रंग विकास और संतुलन से जुड़ा माना जाता है. चूल्हा और सिंक के बीच छोटा सा पौधा रखना भी अच्छा उपाय माना जाता है. मनी प्लांट, तुलसी या कोई छोटा पत्तेदार पौधा यहां रखा जा सकता है. इससे जगह में ताजगी भी आती है और देखने में भी किचन ज्यादा सुंदर लगती है. ध्यान रखें कि पौधा सूखा या मुरझाया न रहे, वरना उल्टा असर माना जाता है.

    क्रिस्टल या पिरामिड का उपयोग
    कई लोग किचन के वास्तु संतुलन के लिए क्रिस्टल या छोटा पिरामिड भी रखते हैं. मान्यता है कि इससे आसपास की नकारात्मकता कम होती है और ऊर्जा का प्रवाह संतुलित रहता है. इसे चूल्हा और सिंक के बीच या ऊपर की शेल्फ पर रखा जा सकता है. यह सजावट का हिस्सा भी बन जाता है और देखने में भी अच्छा लगता है.
    सिंक को गीला न रहने दें
    एक और सरल लेकिन अहम आदत यह है कि सिंक को हमेशा साफ और सूखा रखने की कोशिश करें. लगातार गीलापन पानी तत्व को ज्यादा सक्रिय मानता है, जिससे असंतुलन बढ़ता है. बर्तन धोने के बाद सिंक पोंछ देना, पानी जमा न रहने देना और आसपास की जगह साफ रखना अच्छा माना जाता है. इससे किचन में स्वच्छता भी रहती है और मानसिक रूप से भी हल्कापन महसूस होता है.

    इस्तेमाल न होने पर चूल्हा ढकें
    अगर चूल्हा और सिंक बहुत पास हैं, तो काम खत्म होने के बाद चूल्हे को ढक देना भी अच्छा उपाय माना जाता है. इससे आग तत्व की सक्रियता कम मानी जाती है और पानी-आग का सीधा संपर्क घटता है. आजकल मार्केट में सुंदर कवर या स्लैब कवर आसानी से मिल जाते हैं, जो किचन को साफ-सुथरा भी दिखाते हैं.
    छोटे बदलाव, बड़ा असर
    किचन में चूल्हा और सिंक का एक ही स्लैब पर होना कई घरों में सामान्य बात है. जरूरी नहीं कि हर बार इसे बदलना ही पड़े. सही समझ और छोटे-छोटे संतुलन वाले उपायों से माहौल बेहतर किया जा सकता है. असल बात यह है कि किचन आरामदायक, साफ और व्यवस्थित लगे. जब जगह संतुलित दिखती है, तो काम करने वाले व्यक्ति का मन भी शांत रहता है और घर का माहौल भी हल्का महसूस होता है.

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