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    मां बनने की आड़ में बिजनेस, 54 हजार करोड़ का हेल्थ सेक्टर घोटाला?

    मातृत्व पर 'सर्जरी' का साया: कुदरती अहसास नहीं, अब करोड़ों का कारोबार बनता प्रसव

    भोपाल | आज के दौर में मां बनने की प्रक्रिया अब केवल प्राकृतिक सुख का विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह सुविधा और भारी-भरकम खर्च का सवाल बन चुकी है। डॉक्टरों और अस्पतालों के बदलते रवैये ने प्रसूता को 'मरीज' और प्रसव (डिलीवरी) को एक 'बीमारी' की तरह पेश करना शुरू कर दिया है। आंकड़ों के अनुसार, भोपाल जैसे बड़े शहरों में निजी अस्पतालों में हर दूसरा और सरकारी अस्पतालों में हर तीसरा बच्चा ऑपरेशन टेबल पर पैदा हो रहा है। 'हाई रिस्क प्रेगनेंसी' के नाम पर डराकर परिजनों को सिजेरियन (C-section) के लिए मानसिक रूप से मजबूर किया जा रहा है।

    निजी बनाम सरकारी: अस्पताल बदलते ही बदलती है रिपोर्ट
    राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के आंकड़े एक चौंकाने वाला सच उजागर करते हैं। भोपाल के निजी अस्पतालों में सिजेरियन प्रसव का दर 45 प्रतिशत से अधिक है, जबकि सरकारी अस्पतालों में यह लगभग 34 प्रतिशत है। एक ही शहर और एक जैसी परिस्थितियों के बावजूद अस्पताल की श्रेणी बदलते ही प्रसव का तरीका बदल जाता है। पिछले एक दशक में प्रदेश में सिजेरियन की संख्या लगभग दोगुनी हो चुकी है। यह दर्शाता है कि वार्ड से लेकर ऑपरेशन थिएटर तक परिजनों के मन में जटिलताओं का ऐसा डर पैदा किया जाता है कि उनके पास सर्जरी की सहमति देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।

    सुरक्षा का भ्रम और करोड़ों का 'चीरा-टांका'
    डॉक्टर अक्सर यह तर्क देते हैं कि सिजेरियन सुरक्षित और जल्दी होने वाली प्रक्रिया है, जिससे प्रसव पीड़ा से बचा जा सकता है। लेकिन इस 'सुविधा' के पीछे एक बड़ा आर्थिक गणित छिपा है। वर्ष 2024-25 के अनुमान बताते हैं कि देश में हुए 1.97 करोड़ प्रसवों में से 54 लाख सिजेरियन थे। यदि औसतन एक लाख रुपये का खर्च जोड़ा जाए, तो यह बाजार 54 हजार करोड़ रुपये से अधिक का है। अकेले भोपाल में इस माध्यम से सालाना औसतन 200 करोड़ रुपये का कारोबार हो रहा है।

    मां और शिशु के स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव
    विशेषज्ञ मानते हैं कि सिजेरियन एक जीवनरक्षक तकनीक है, लेकिन अनावश्यक उपयोग इसके खतरों को बढ़ाता है। सर्जरी से जन्मे बच्चों में भविष्य में एलर्जी, मोटापा और कम रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) जैसी समस्याएं देखी गई हैं। वहीं, मां के लिए अगली गर्भावस्था में अधिक ब्लीडिंग, प्लेसेंटा की जटिलताएं और संक्रमण का खतरा बना रहता है। भावनात्मक रूप से भी, प्राकृतिक प्रसव की तुलना में सिजेरियन के बाद रिकवरी में अधिक समय और दवाओं की आवश्यकता होती है।

    बदलती जीवनशैली और प्रसव के प्रति भय
    विशेषज्ञों के अनुसार, सिजेरियन बढ़ने के पीछे केवल व्यावसायिक कारण नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव भी जिम्मेदार हैं। एम्स भोपाल के स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अजय हलदर बताते हैं कि अब कई महिलाएं प्रसव पीड़ा सहन नहीं करना चाहतीं और डॉक्टर भी किसी भी प्रकार का जोखिम लेने से बचते हैं। वहीं, वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी का मानना है कि शहरी जीवनशैली में प्रसव को लेकर भय और अनिश्चितता बढ़ गई है। शुभ मुहूर्त या अपनी सुविधानुसार समय चुनने की चाहत और परिवारों का दबाव भी प्राकृतिक प्रसव के बजाय सर्जरी के निर्णय को प्रभावित करता है।

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