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    विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों के समन्वय से आमजन को पहुंचे अधिक से अधिक स्वास्थ्य लाभ : आयुष मंत्री परमार

    भोपाल : उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा एवं आयुष मंत्री इन्दर सिंह परमार ने कहा कि आयुर्वेद भारत की प्राचीन और समृद्ध चिकित्सा पद्धति है, इसे आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी नवाचारों के साथ जोड़कर वैश्विक स्तर पर स्थापित किए जाने की आवश्यकता है। परमार ने आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में प्रमाण-आधारित शोध, क्लिनिकल स्टडी और आधुनिक तकनीकों के उपयोग को बढ़ावा देने पर बल दिया।

    आयुष मंत्री परमार शुक्रवार को भोपाल स्थित पं. ख़ुशीलाल शर्मा शासकीय (स्वशासी) आयुर्वेद महाविद्यालय एवं संस्थान के रजत जयंती सभागार में, राष्ट्रीय आयुष मिशन मप्र एवं पं. ख़ुशीलाल शर्मा शासकीय (स्वशासी) आयुर्वेद महाविद्यालय एवं संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी "नेत्रम-2026" के समापन सत्र में सहभागिता कर, संगोष्ठी की वर्तमान परिदृश्य के अनुरूप आवश्यकता, महत्ता, प्रासंगिकता एवं निरंतरता के आलोक में अपने विचार साझा कर रहे थे।

    मंत्री परमार ने इंटीग्रेटेड मेडिकल केयर (Integrated Medical Care) की आवश्यकता पर विशेष जोर देते हुए कहा कि विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों के समन्वय से आम जनता को अधिक से अधिक लाभ पहुंचाया जा सकता है। परमार ने यह भी कहा कि क्रॉनिक बीमारियों तथा कैंसर जैसी जटिल व्याधियों पर शोध को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है, ताकि इन रोगों के प्रभावी एवं समन्वित उपचार विकसित किए जा सकें।

    मंत्री परमार ने यह भी कहा कि इस प्रकार के सेमिनार और संगोष्ठियों का उद्देश्य केवल आयोजन तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इनसे प्राप्त निष्कर्ष और सुझाव, समाज तथा चिकित्सा क्षेत्र में वास्तविक रूप से उपयोगी सिद्ध होने चाहिए। परमार ने कहा कि संगोष्ठी का उद्देश्य तभी सार्थक माना जाएगा, जब इसके माध्यम से प्राप्त ज्ञान और शोध कार्यों का लाभ आम जनता तक पहुंचे। परमार ने ऐसे संगोष्ठियों के बिना पुनरावृत्ति के सतत् आयोजन पर भी जोर दिया। मंत्री परमार ने कहा कि समस्त चिकित्सा विधाओं का एकमात्र लक्ष्य आमजन के स्वास्थ्य की सुरक्षा होना चाहिए। परमार ने समस्त चिकित्सा पद्धतियों को आमजन के रोग निदान के लिए एक साथ शोधपरक रूप से आगे आने की सराहना की। परमार ने कहा कि स्वस्थ भारत के संकल्प की सिद्धि के लिए, आयुर्वेद चिकित्सा विधा को भारतीय दर्शन अनुरूप वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ शोध एवं अनुसंधान की ओर बढ़ाने की आवश्यकता है।

    12 और 13 मार्च को आयोजित इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश के 11 राज्यों से आए आयुर्वेद एवं आधुनिक नेत्र रोग विशेषज्ञों, शिक्षकों तथा शोधार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। संगोष्ठी का उद्देश्य आयुर्वेदिक नेत्र चिकित्सा में हो रहे नवीन अनुसंधान, पारंपरिक ज्ञान तथा साक्ष्य-आधारित चिकित्सा पद्धतियों के समन्वय पर विचार-विमर्श करना था।

    संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र के दौरान स्मारिका (Souvenir) का विमोचन किया गया, जिसमें 9 की-नोट व्याख्यान तथा 172 शोध सार (Abstracts) प्रकाशित किए गए। दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान कुल 8 वैज्ञानिक सत्र एवं 2 प्लेनरी सत्र आयोजित किए गए, इनमें 120 शोध पत्रों का प्रस्तुतीकरण किया गया। इसके अतिरिक्त 35 डिजिटल पोस्टर प्रस्तुतियाँ भी प्रदर्शित की गईं।

    इन सत्रों में शालाक्य तंत्र, क्रियाकल्प चिकित्सा, साक्ष्य-आधारित आयुर्वेदिक उपचार पद्धतियाँ तथा आधुनिक नेत्र विज्ञान के साथ आयुर्वेद के समन्वय जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विशेषज्ञों द्वारा व्याख्यान एवं विचार-विमर्श किया गया।

    कार्यक्रम में उपस्थित विशेषज्ञों ने भी आयुर्वेदिक नेत्र चिकित्सा के क्षेत्र में नवीन अनुसंधान, वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण तथा आधुनिक तकनीकों के समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया।

    संगोष्ठी के अंत में आयोजकों ने सभी अतिथियों, विशेषज्ञों, शोधार्थियों एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए आशा व्यक्त की कि इस संगोष्ठी के माध्यम से प्राप्त ज्ञान एवं विचार-विमर्श भविष्य में आयुर्वेदिक नेत्र चिकित्सा के विकास तथा साक्ष्य-आधारित अनुसंधान को नई दिशा प्रदान करेंगे।

    संगोष्ठी के समापन अवसर पर प्रमुख सचिव आयुष शोभित जैन, कुलगुरु बरकतउल्ला विश्वविद्यालय भोपाल सुरेश कुमार जैन, भारतीय चिकित्सा पद्धति राष्ट्रीय आयोग नई दिल्ली अंतर्गत आचार एवं पंजीयन बोर्ड (Board of Ethics and Registration) के अध्यक्ष डॉ सुश्रुत कनौजिया एवं अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान नई दिल्ली की प्राध्यापक डॉ मंजूषा राजगोपाल एवं पं. ख़ुशीलाल शर्मा शासकीय (स्वशासी) आयुर्वेद महाविद्यालय के प्रधानाचार्य डॉ. उमेश शुक्ला सहित विभिन्न राज्यों से पधारे विषयविद, शोधार्थी और संस्थान के प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियों सहित अन्य गणमान्य विद्वतजन उपस्थित थे।

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