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    विदेशों में बढ़ा रीवा के सुंदरजा आम का क्रेज, ग्लोबल ब्रांड बनने की ओर बड़ा कदम

    रीवा। मध्य प्रदेश के रीवा जिले का मशहूर सुंदरजा आम अपनी बेमिसाल मिठास और खुशबू के दम पर अब सात समंदर पार भी अपनी धाक जमा रहा है। रीवा के कुठुलिया फल अनुसंधान केंद्र में आम की लगभग 237 विभिन्न प्रजातियों पर शोध कार्य किया जाता है, जिनमें से सुंदरजा आम को अपनी अनूठी विशेषताओं के कारण भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग (GI Tag) भी हासिल हो चुका है। गोविंदगढ़ के ऐतिहासिक बगीचों से सफर शुरू कर यह विशेष आम आज वैश्विक स्तर पर अपनी महक बिखेर रहा है। इस आम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरी तरह से रेशा-मुक्त (बिना रेशे वाला) होता है और इसमें शुगर की मात्रा इस तरह संतुलित होती है कि मधुमेह के रोगी भी इसका बेझिझक आनंद ले सकते हैं।

    रंग-रूप और बगीचों की बढ़ती लोकप्रियता

    शुरुआती दौर में सुंदरजा आम की पैदावार सिर्फ रीवा के ऐतिहासिक गोविंदगढ़ किले के शाही बागों तक ही सीमित थी, परंतु अब गोविंदगढ़ क्षेत्र के अलावा कुठुलिया फल अनुसंधान केंद्र में भी बड़े पैमाने पर इसे उगाया जा रहा है। इन दोनों स्थानों के आमों में रंग का मामूली अंतर देखने को मिलता है; जहां गोविंदगढ़ के बागों का सुंदरजा आम हल्के सफेद रंग की आभा लिए होता है, वहीं कुठुलिया अनुसंधान केंद्र का आम हल्का हरा दिखाई देता है। इसकी बढ़ती ख्याति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सुंदरजा के बगीचों की सालाना नीलामी की कीमत साल-दर-साल आसमान छू रही है। जिस बाग की बोली कभी महज एक लाख रुपये से शुरू हुई थी, इस साल उसकी नीलामी का आंकड़ा 20 लाख रुपये को भी पार कर गया है। बगीचे की बोली लगाने वाले ठेकेदारों का कहना है कि बाजार में इस आम की मांग इतनी ज्यादा है कि इसकी आपूर्ति करना एक बड़ी चुनौती बन गया है।

    शाही पसंद से लेकर वैश्विक पहचान तक का सफर

    रीवा रियासत के दौर में सुंदरजा आम केवल राजा-महाराजाओं और राजघरानों की पहली पसंद हुआ करता था, लेकिन समय के साथ इसकी लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि आज आम जनता से लेकर विदेशी लोग भी इसके स्वाद के कायल हो चुके हैं। भारत के प्रमुख महानगरों और राज्यों जैसे दिल्ली, मुंबई, छत्तीसगढ़ और गुजरात से लोग सीजन शुरू होने से पहले ही इसके लिए एडवांस बुकिंग करा लेते हैं। घरेलू बाजार के अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुंदरजा की जबरदस्त मांग है; विशेष रूप से फ्रांस, इंग्लैंड, अमेरिका और अरब देशों में इसे बेहद चाव से खाया जाता है। हाल ही में इंदौर में आयोजित हुए प्रतिष्ठित ब्रिक्स सम्मेलन में भी इस आम को प्रदर्शित किया गया था, जहां वैश्विक प्रतिनिधियों ने इसकी जमकर सराहना की।

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