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    जालौर में विकास की आंधी, सैकड़ों हरे पेड़ों पर चली कुल्हाड़ी

    जालौर: लूनी-समदड़ी-भीलड़ी वाया जालौर 278 किलोमीटर लंबे रेल लाइन के दोहरीकरण कार्य में हजारों की संख्या में हरे पेड़ों की बलि चढ़ गई। इन पेड़ों में राज्य वृक्ष खेजड़ी, नीम और जाल के पेड़ अधिक हैं। ट्रेन में सफर करने के दौरान हरियाली के विनाश की बदनुमा तस्वीर साफ नजर आ रही है।

    जालौर-बागरा के बीच दोहरीकरण कार्य के तहत मिट्टी को समतल करने का कार्य किया गया। जागनाथ रेलवे स्टेशन के सामने से 100 साल पुराने नीम के पेड़ों को भी उखाड़ा गया। इस क्षेत्र में करीब 800 मीटर के दायरे में नीम, खेजड़ी और जाल के सैकड़ों पेड़ों को उखाड़ा गया।

    विकल्प नहीं तलाशे गए

    विशेषज्ञों का कहना है कि विकास के नाम पर बड़े स्तर पर पेड़ों की बलि दी गई। इन पेड़ों की कटाई से बचने के विकल्प नहीं तलाशे गए। पुराने नीम और खेजड़ी के वृक्षों की री-ट्रांसप्लांटेशन से पेड़ों को बचाया जा सकता था।

    इधर, रेलवे के अधिकारी और कार्मिक भी पेड़ों की कटाई की बात स्वीकार रहे हैं। उनका कहना है कि री-ट्रांसप्लांटेशन से पेड़ों को बचाया जा सकता था, लेकिन रेलवे के कार्य को तेजी प्रदान करने के दौरान यह जटिल प्रक्रिया हो जाती।

    एक पेड़ के एवज में दस पेड़ लगाएंगे, ये है रेलवे की नीति

    यह कार्य रेलवे कंस्ट्रक्शन विभाग की ओर से करवाया जा रहा है। रेलवे की स्पष्ट नीति है, जहां पर भी एक पेड़ कटेगा, उसकी एवज में 10 पौधे लगाए जाएंगे। दोहरीकरण कार्य में रेलवे की जमीन के पास ही किसानों के खेत ही होते हैं। ऐसे में पेड़ों की शिफ्टिंग संभव नहीं हो पाती। उन पेड़ों को हटाना या काटने का विकल्प ही मौजूद रहता है। रेलवे की ओर से बड़े स्तर पर पेड़ लगाए जाएंगे।
    -अनुराग त्रिपाठी, मंडल रेल प्रबंधक, जोधपुर

    कितने कटे, सर्वे होगा

    रेलवे कंस्ट्रक्शन डिपार्टमेंट के अधिकारी ने कहा, प्रोजेक्ट के अंतर्गत बड़े पेड़ों की कटाई कर उन्हें हटाया है। कितने पेड़ काटे गए या हटाए गए, इसका सर्वे करवाया जा रहा है। उसकी एवज में रेल भूमि पर 7 गुना पौधे लगाए जाएंगे। उन्होंने कहा, बड़े पेड़ों की शिफ्टिंग आसान नहीं होती, इसलिए उन्हें हटाने का ही विकल्प बचता है।

    कटाई से बेहतर री-ट्रांसप्लांटेशन

    थलवाड़ स्थित ब्रह्मऋषि आश्रम एवं पर्यावरण संस्थान के संत आनंददास महाराज का कहना है कि विकास के नाम पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई होती है, जो प्रकृति के साथ खिलवाड़ है। पेड़ों की कटाई से बचने के विकल्प नहीं तलाशे जा रहे। कई मौकों पर 70 से 100 साल पुराने पेड़ों की कटाई की जाती है। बेहतर विकल्प के रूप में नीम, खेजड़ी या अन्य महत्वपूर्ण औषधीय पेड़ों की कटाई से बचने के साथ इनकी शिफ्टिंग की जाए।

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