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    हमले दुबई पर हो रहे हैं और तकलीफ अमेरिका को, ट्रंप की दुखती नस दबा रहा है ईरान

    तेहरान । ईरान ने साफ कर दिया है कि वो किसी के आगे झुकने वाला नहीं है। इसके लिए उसे जो भी कीमत चुकाना पड़े चुकाएगा। इसी रणनीति के चलते ईरान ऐसे हमले कर रहा है जिससे अमेरिका को ज्यादा से ज्यादा तकलीफ हो। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दुखती नस है यूएई। यही वजह है कि ईरान इसी नस को बार बार दबा रहा है। हाल ही में ईरान ने यूएई पर बड़े पैमाने पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए गए हैं, जिससे वहां के कई अहम ठिकाने प्रभावित हुए हैं। आंकड़ों के अनुसार अब तक यूएई पर 1,700 से अधिक ड्रोन, सैकड़ों बैलिस्टिक मिसाइलें और कई क्रूज मिसाइलें दागी जा चुकी हैं।
    इन हमलों का असर यूएई के प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर पर साफ दिखाई दे रहा है। आलीशान होटल, तेल रिफाइनरी, एयरपोर्ट और व्यावसायिक क्षेत्र निशाने पर रहे हैं, जिससे न केवल आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हुई हैं बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता पर भी खतरा मंडराने लगा है। फुजैराह के औद्योगिक क्षेत्रों में हमलों के बाद धुएं के गुबार देखे गए, जो नुकसान की गंभीरता को दर्शाते हैं।
    विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के इन हमलों के पीछे सिर्फ सैन्य कारण नहीं, बल्कि गहरी आर्थिक रणनीति भी छिपी हुई है। दरअसल, यूएई अमेरिका के लिए एक महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार है, जो आने वाले वर्षों में बड़े पैमाने पर निवेश करने की योजना बना रहा है। अनुमान है कि यूएई द्वारा करीब 1.4 ट्रिलियन डॉलर का निवेश अमेरिका में किया जाना प्रस्तावित है, जो कुल विदेशी निवेश का बड़ा हिस्सा है। यही कारण है कि यूएई को निशाना बनाकर ईरान अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका की आर्थिक योजनाओं को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है। अगर यूएई की अर्थव्यवस्था अस्थिर होती है, तो इसका सीधा असर अमेरिका में आने वाले निवेश पर पड़ेगा। इस तरह ईरान बिना सीधे टकराव के भी अमेरिका पर दबाव बनाने की रणनीति अपना रहा है। इसके अलावा, यूएई खासकर दुबई को वैश्विक निवेश केंद्र के रूप में देखा जाता है। पिछले कुछ वर्षों में यहां विदेशी निवेशकों के लिए नियमों को आसान बनाया गया है, जिससे यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निवेश का प्रमुख हब बन गया है। ऐसे में लगातार हमलों से यूएई की सुरक्षित और स्थिर छवि को नुकसान पहुंच सकता है। कुल मिलाकर, यह संघर्ष अब केवल सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक मोर्चों पर भी लड़ा जा रहा है, जिसका असर वैश्विक स्तर पर महसूस किया जा सकता है।

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