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    बंगाल भर्ती घोटाले में ईडी की बड़ी कार्रवाई, ममता के करीबी रथिन घोष जांच के घेरे में

    कोलकाता | पश्चिम बंगाल के बहुचर्चित नगर निकाय (Municipal) भर्ती घोटाले की कड़ियाँ सुलझाने के लिए प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अपनी कार्रवाई का दायरा बढ़ा दिया है। इसी सिलसिले में केंद्रीय जांच एजेंसी ने राज्य के पूर्व खाद्य मंत्री रथिन घोष को शुक्रवार को साल्ट लेक स्थित अपने दफ्तर (CGO कॉम्प्लेक्स) में तलब किया। ईडी के आला अधिकारियों ने पूर्व मंत्री को सामने बिठाकर करीब साढ़े नौ घंटे तक मैराथन पूछताछ की। सूत्रों के अनुसार, इस लंबी पूछताछ के दौरान उनसे भर्ती प्रक्रिया में हुई गड़बड़ियों और पैसों के संदिग्ध लेन-देन को लेकर कई कड़े सवाल पूछे गए।

    साढ़े नौ घंटे की मैराथन पूछताछ और पूर्व मंत्री का बयान

    शुक्रवार सुबह ईडी दफ्तर पहुंचे पूर्व खाद्य मंत्री रथिन घोष से देर शाम तक गहन पूछताछ की गई। साढ़े नौ घंटे की इस लंबी कानूनी प्रक्रिया का सामना करने के बाद जब रथिन घोष दफ्तर से बाहर निकले, तो उन्होंने मीडिया से बेहद संक्षिप्त बात की। पूर्व मंत्री ने बताया कि उन्होंने जांच अधिकारियों द्वारा पूछे गए सभी सवालों के जवाब दे दिए हैं और वे जांच में पूरा सहयोग कर रहे हैं। हालांकि, जब उनसे अंदर पूछे गए विशिष्ट सवालों और चर्चा के बारे में जानना चाहा, तो उन्होंने इस पर कुछ भी बोलने से साफ इनकार कर दिया।

    नियुक्तियों में धांधली और वित्तीय हेरफेर पर केंद्रित रहे सवाल

    प्रवर्तन निदेशालय के सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, जांच अधिकारियों ने पूर्व मंत्री के सामने कई दस्तावेज और डिजिटल सबूत रखे। पूछताछ का मुख्य फोकस इस बात पर रहा कि नगर निकायों में ग्रुप-सी और ग्रुप-डी के पदों पर नियुक्तियां करने के बदले किस तरह से अवैध रूप से पैसों का हेरफेर किया गया। जांच एजेंसी इस बात का सुराग लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या इन कथित अवैध नियुक्तियों के तार पूर्व मंत्री या उनके करीबी सहयोगियों से सीधे जुड़े हुए थे और इस रकम का अंतिम लाभार्थी कौन था।

    सत्ता परिवर्तन के बाद सूबे में बढ़ी राजनीतिक हलचल

    तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके रथिन घोष से केंद्रीय एजेंसी की इस लंबी पूछताछ के बाद पश्चिम बंगाल के सियासी गलियारों में एक बार फिर गरमागरम बहस छिड़ गई है। राज्य में सत्ता परिवर्तन और भाजपा सरकार के गठन के बाद से ही पूर्ववर्ती सरकार के नेताओं और मंत्रियों के खिलाफ केंद्रीय जांच एजेंसियों का शिकंजा और कसता जा रहा है। विपक्षी दलों का कहना है कि यह कानून के तहत हो रही निष्पक्ष कार्रवाई है, जबकि पूर्ववर्ती सत्ताधारी दल से जुड़े लोग इसे राजनीतिक प्रतिशोध का हिस्सा बता रहे हैं।

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