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    फैसल मलिक का संघर्ष भरा सफर, जब वकील बनने निकले थे लेकिन पहुंचे कैमरे के सामने

    कभी असिस्टेंट तो कभी लाइन प्राेड्यूसर बनकर मुंबई में अपने लिए सही रास्ता खोज रहे फैसल मलिक को तब कहां पता था.. कि यह सब कुछ उनकी एक्टिंग से आसान बनेगा। 2012 में फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वसेपुर 2’ से शुरू हुए उनके अभिनय के सफर ने आज उन्हें घर-घर में ‘पंचायत’ के प्रह्लाद चा के रूप में पहचान दिला दी है। फैसल मलिक से अमर उजाला के लिए नितिन यादव ने खास बातचीत की।

    एक्टिंग का विचार कहां से आया?

    स्कूल के दिनों में मैं कुछ ऐसा था कि पढ़ाई मत करवाओ बस, बाकि सब करवा लो। कुछ साल बाद मुंबई में अपने बड़े भाई के पास चला गया। लगा एक्टिंग कर लूंगा तो एक्टिंग स्कूल में एडमिशन कराया। जिम जॉइन किया पर तीन-चार महीने में ही फ्लॉप हो गया। 

    मुंबई आपको ठीक कर देता है कि सीधे हो जाओ, पहले यहां आपको मेहनत करनी पड़ेगी। कुछ वक्त बाद बढ़ती महंगाई देखकर मैंने सोचा कि एक्टिंग भूल जाता हूं। फिर सोचा मास कॉम कर लेता हूं। उसमें फिल्ममेकिंग भी होती है। इस तरह सीखते-सीखते लाइफ शुरू की। दो-तीन चैनल में काम किया। पिक्चर बनाई..प्रोड्यूस की। यह सब करते-करते एक्टिंग में आया।

    फिल्म इंडस्ट्री के अलावा भी कुछ काम किया था? सुना है वकील बनने भी निकले थे?

    मैं जब इलाहबाद (अब प्रयागराज) में था, तब काम किया था कार फाइनेंस में। वहां मुझसे कार ही नहीं बेची गई। फिर एक मामा थे, उन्होंने एक पीसीओ खोला था तो तीन घंटे की नौकरी वहां करता था। 
    वकील बनने भी निकला। पांच साल का कोर्स था। घर वालों ने एंट्रेंस देने को कहा। एंट्रेंस दिया तो मेरा हो गया। लेकिन मेरे घर में बहुत वकील हैं तो मैंने सरेंडर कर दिया। मुझे पता था कि अगर मुझे कुछ हाेगा तो ये लोग बचा ही लेंगे मुझे। 

    पहला एक्टिंग का मौका कब मिला?

    जब प्रोडक्शन करता था छोटा-मोटा तब ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’में मिला। वहां मैं प्रोडक्शन टीम में था। एक एक्टर चल गया तो मैंने उसकी जगह यूं ही जाकर एक्टिंग कर ली बस।

    ‘वासेपुर’ में आपके सामने पकंज त्रिपाठी थे। पहला शूट था। मन में क्या था?

    उस वक्त ऐसा कुछ नहीं था। पंकज जी के साथ मेरा जो सीन था उसे हम असल बूचड़खाने में शूट कर रहे थे। इतनी बदबू थी वहां तो उस वक्त तो दिमाग में बस इतना था कि जल्दी सीन ओके करके भाग जाएं। ये तो बाद में पता चला कि इस कैरेक्टर के अभी और पांच-छह सीन हैं। मैंने कहा फंस गए ये तो। जब फिल्म आई तो लोगों को वह आदमी याद था। इस फिल्म के बाद भी मैंने कुछ समय तक एक्टिंग नहीं की। मेरे लिए सबकुछ ‘पंचायत’ ने बदला है।

    पंचायत कैसे मिली?

    एक दिन इस शो के क्रिएटर दीपक मिश्रा और चंदन मेरे पास आए और बोले मुझे इस शो में कास्ट कर रहे हैं। मैंने कहा- मैं नहीं कर पाऊंगा। अभी कुछ और काम कर रहा हूं। लेकिन, उन्हें बहुत भरोसा था मेरे ऊपर। कामयाबी का सारा श्रेय उन्हें जाता है। 

    सचिव जी (जितेंद्र कुमार) के साथ कैसी बॉन्डिंग है आपकी?

    यह शो करने से पहले मैं जीतू का फैन था। जीतू मुन्ना जज्बाती नाम की एक चीज करते थे। मैंने उन्हें रोककर एक बार बोला कि मैं तुम्हारा फैन हूं। हम लोग अभी तो दोस्त बहुत अच्छे हैं। 

    सीरीज में नीना गुप्ता और रघुबीर यादव जैसे जैसे बड़े कलाकार भी हैं। उनके साथ कैसी केमिस्ट्री रही है?

    ‘पंचायत’ शो की जो ताकत है वो यही दोनों लोग हैं। इनकी एनर्जी और इनके अनुभव। इन्होंने हमें सिखा रखा है। दूसरों के सीन में एक डायलॉग हो तो भी वो खड़े रहते हैं। मैं तो कहता हूं कि यह ब्लेसिंग है कि वो दोनों लोग हमारे साथ हैं। इन दोनों का बहुत एहसान है। 

    अगले सीजन में सुना है कि विधायकी का चुनाव लड़ने वाले हैं? विधायक बनेंगे क्या?

    चंदन लिखता कुछ अलग ही है। जो आप सोचेंगे, वह नहीं लिखेगा। अभी कुछ पता नहीं है। स्क्रिप्ट आई नहीं है।

    प्रहलाद चा के बाद भी फैसल मलिक डाउन टू अर्थ हैं। स्टारडम के नशे से खुद को कैसे बचा रखा है?

    जितने भी लोग हैं, फैमिली और दोस्तों को मिलाकर बहुत बड़े लोगों का ग्रुप है हमारा। कुछ भी अगर दाएं-बाएं होता है तो इनके अंदर इतना पावर है कि ये मुझे मार भी सकते हैं। सबने समझा रखा है कि तमीज से रहो। सामने वाले से इज्जत से बात करेंगे, यह मां-बाप ने फिट कर रखा है। भाई, दोस्त, बीवी सब टाइट किए रहते हैं।

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