आर्थिक विकास की रफ्तार और मुद्रा अवमूल्यन का प्रभाव
मुंबई: ईरान संकट के चलते वैश्विक स्तर पर पैदा हुई अस्थिरता का सीधा असर अब भारतीय मुद्रा पर दिखने लगा है, जहाँ रुपया डॉलर के मुकाबले गिरकर 95 के स्तर से नीचे चला गया है। एसबीआई रिसर्च की होलिया रिपोर्ट में यह चेतावनी दी गई है कि यदि रुपये की स्थिति इसी स्तर पर बनी रहती है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था का कुल आकार सिमटकर 4.04 लाख करोड़ डॉलर रह जाएगा। ऐसी स्थिति में भारत के 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य साल 2029-30 से पहले पूरा होना बेहद कठिन नजर आ रहा है। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि बाहरी कारकों और बाजार में अनियंत्रित सट्टेबाजी ने रुपये की सेहत बिगाड़ी है, जिससे निपटने के लिए अब भुगतान संतुलन के मोर्चे पर ठोस संरचनात्मक बदलाव करने की तत्काल आवश्यकता है।
भुगतान संतुलन सुधारने के लिए नीतिगत उपायों की दरकार
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने और परिवहन व बीमा लागत में हुई भारी बढ़ोतरी ने देश के आर्थिक संतुलन को बिगाड़ दिया है। इस गंभीर समस्या से उबरने के लिए विशेषज्ञों ने एक व्यापक नीतिगत पैकेज लागू करने का सुझाव दिया है, जिसमें विदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए विशेष बॉन्ड जारी करना एक प्रभावी विकल्प हो सकता है। यह रिपोर्ट प्रधानमंत्री द्वारा हाल ही में की गई उस अपील के बाद आई है जिसमें उन्होंने नागरिकों से विदेशी मुद्रा बचाने के लिए ईंधन के विवेकपूर्ण उपयोग, सोने की खरीद पर लगाम लगाने और विदेश यात्राओं को कुछ समय के लिए टालने का आग्रह किया था ताकि आयात पर निर्भरता कम की जा सके और निर्यात की प्रतिस्पर्धी क्षमता को वैश्विक स्तर पर मजबूती प्रदान की जा सके।
जीडीपी वृद्धि दर के अनुमान और भविष्य की संभावनाएँ
अर्थव्यवस्था के भविष्य के आकलन को लेकर एसबीआई रिसर्च ने अनुमान जताया है कि चालू वित्त वर्ष की चौथी तिमाही में वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 7.2 प्रतिशत के आसपास बनी रह सकती है। हालांकि, अगले वित्त वर्ष 2026-27 के लिए विकास दर की रफ्तार थोड़ी धीमी होकर 6.6 प्रतिशत रहने की संभावना है, जबकि पूरे वित्त वर्ष 2025-26 के लिए यह आंकड़ा 7.5 प्रतिशत के स्तर को छू सकता है। आगामी 29 मई को राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी होने वाले वार्षिक जीडीपी के अस्थायी अनुमानों पर अब सबकी निगाहें टिकी हैं, क्योंकि यही आंकड़े तय करेंगे कि आने वाले समय में भारतीय बाजार और विकास दर वैश्विक चुनौतियों का सामना किस मजबूती के साथ कर पाएंगे।


