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    Homeराजनीतिबिहार कांग्रेस में पहली बार उठे सवर्णों की उपेक्षा के स्वर

    बिहार कांग्रेस में पहली बार उठे सवर्णों की उपेक्षा के स्वर

    पटना। बिहार कांग्रेस में पहली बार सवर्णों की उपेक्षा के स्वर उठ रहे हैं। कांग्रेस विधायक दल की बैठक में पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और कांग्रेस कार्य समिति के सदस्य डा. अखिलेश प्रसाद सिंह ने यह मामला उठाया। उनका कहना था कि इस समय पार्टी के सवर्ण नेता-कार्यकर्ता स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।

    सवर्णों की उपेक्षा का आरोप पहली बार 
    अनुसूचित जातियों, पिछड़ों एवं अल्पसंख्यकों की उपेक्षा के आरोप पहले भी लगते रहे हैं। लेकिन, सवर्णों की उपेक्षा का आरोप पहली बार लगा है। विधायक दल की बैठक रविवार को हुई थी। डा. सिंह ने सवर्णों की उपेक्षा के बारेे में जो कुछ कहा, वह इस वर्ग के आम कांग्रेसियों की राय है। असल में कांग्रेस पहले के चुनावों की तुलना में इस बार बदली-बदली सी नजर आ रही है।

    कांग्रेस भी राजद के राह पर चल रही 
    पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी भी बिहार की अपनी यात्राओं में दलित, पिछड़े, अति पिछड़े और अल्पसंख्यकों के कल्याण की बात अधिक करते हैं। आरक्षण की सीमा बढ़ाने की उनकी वकालत सवर्ण समर्थकों को नहीं भा रही है। उन्हें लग रहा है कि कांग्रेस भी राजद के राह पर चल रही है। विधायक राजेश राम प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष हैं।

    कृष्णा अल्लाबारू प्रभारी हैं। हाल के दिनों में अनुसूचित जाति से जुड़े दूसरे दलों के कई नेता कांग्रेस से जुड़े हैं।प्रचारित यह किया जा रहा है कि राजेश कुमार के अध्यक्ष बनने से कांग्रेस के प्रति रविदास बिरादरी का झुकाव बढ़ेगा।जाति आधारित गणना में रविदास की आबादी सवा पांच प्रतिशत बताई गई है। यह पासवान से मामूली कम है।

    धारणा यह बनाई जा रही है कि व्यापक रूप से यह आबादी अगर कांग्रेस से जुड़ जाए तो उसकी चुनावी उपलब्धि पहले से कहीं बेहतर होगी। रविदास के अलावा पासी बिरादरी को जोड़ने के लिए भी कांग्रेेस श्रम कर रही है। इनकी आबादी एक प्रतिशत से कम है। हालांकि, कांग्रेस के नेता दलितों के प्रभाव में वृद्धि या सवर्णों की उपेक्षा पर खुल कर कुछ नहीं बोल रहे हैं। लेकिन, निजी बातचीत में इन दोनों स्थिति को स्वीकार किया जा रहा है।

    पार्टी के सवर्ण समर्थकों का कहना है कि चुनावी वर्ष में सभी दलों में अतिथियों की संख्या बढ़ ही जाती है। कांग्रेस में नजर आ रही चहल-पहल भी उसी की देन है। इसे स्थायी मानने की भूल नहीं होनी चाहिए। दूसरी तरह सवर्णों के वर्चस्व को यह कह कर चुनौती दी जा रही है कि ये कांग्रेस में हैं ही कितने? सब के सब तो भाजपा में पड़े बैठे हैं।

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