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    चर्चित 90 डिग्री ब्रिज मामले में सरकार का बड़ा फैसला, इंजीनियरों की वापसी

    भोपाल: राजधानी के चर्चित ऐशबाग रेलवे ओवरब्रिज, जिसे अपनी विशिष्ट बनावट के कारण '90 डिग्री ब्रिज' के नाम से जाना जाता है, एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। मध्य प्रदेश सरकार ने इस परियोजना में कथित तकनीकी खामियों और लापरवाही के चलते निलंबित किए गए सात इंजीनियरों को वापस सेवा में बहाल करने का निर्णय लिया है। लगभग एक वर्ष पूर्व हुई इस कार्रवाई के बाद अब इंजीनियरों की वापसी के आदेश ने प्रशासनिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है, जहाँ कुछ लोग इसे राहत मान रहे हैं तो कुछ जांच प्रक्रिया पूर्ण होने से पहले लिए गए इस फैसले पर सवाल उठा रहे हैं।

    विवादित डिजाइन और जनसुरक्षा पर उठे सवाल

    ऐशबाग इलाके में निर्मित इस ओवरब्रिज का विवाद तब शुरू हुआ था जब इसके तीखे मोड़ की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं और स्थानीय नागरिकों ने इसके डिजाइन को दुर्घटनाओं के लिए निमंत्रण बताया। लोगों का तर्क था कि ब्रिज का मोड़ इतना अधिक घुमावदार है कि तेज रफ्तार वाहनों के लिए यहां संतुलन बनाए रखना कठिन होगा, जिससे हादसों का अंदेशा बना रहता है। इस जन आक्रोश और विपक्षी दलों के दबाव के बाद सरकार ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तकनीकी जांच के आदेश दिए थे, जिसमें यह तथ्य सामने आया कि ब्रिज का वास्तविक कोण नब्बे डिग्री न होकर लगभग एक सौ उन्नीस डिग्री है, लेकिन निर्माण के दौरान सुपरविजन की कमी के कारण इसकी बनावट विवादित हो गई।

    इंजीनियरों की बहाली और पदस्थापना का निर्णय

    लोक निर्माण विभाग ने जून २०२५ में निर्माण और डिजाइन से जुड़े जिन अधिकारियों को निलंबित किया था, उनमें दो प्रभारी मुख्य अभियंता भी शामिल थे। सरकार द्वारा जारी नवीनतम आदेश के अनुसार अब इन सात इंजीनियरों को बहाल कर ईएनसी कार्यालय में पदस्थ करने का निर्णय लिया गया है, जिससे विभाग के भीतर एक बड़ी हलचल देखी जा रही है। यद्यपि इन अधिकारियों की वापसी का मार्ग प्रशस्त हो गया है, लेकिन सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बहाली का अर्थ अनिवार्य रूप से क्लीन चिट मिलना नहीं है और प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत नियमानुसार कार्यवाही जारी रहेगी।

    विभागीय जांच का दायरा और जारी रहने वाली प्रक्रिया

    बहाली के बावजूद विभाग ने कुछ वरिष्ठ इंजीनियरों के विरुद्ध जांच को पूरी तरह बंद नहीं किया है और जीपी वर्मा, रवि शुक्ला तथा उमाशंकर मिश्रा जैसे अधिकारियों के खिलाफ तकनीकी लापरवाही के आरोपों पर विभागीय जांच निरंतर चलती रहेगी। इस जांच प्रक्रिया को पूर्ण होने में अभी कुछ महीनों का समय लग सकता है, जिसमें निर्माण के दौरान बरती गई सूक्ष्म तकनीकी त्रुटियों का आकलन किया जाएगा। दूसरी ओर संजय खांडे और शबाना रज्जाक सहित अन्य कुछ अधिकारियों को राहत प्रदान की गई है क्योंकि शुरुआती जांच रिपोर्ट में उनके द्वारा तैयार किए गए डिजाइन में किसी गंभीर तकनीकी दोष की पुष्टि नहीं हुई थी।

    जांच रिपोर्ट के निष्कर्ष और तकनीकी खामियों का विश्लेषण

    वरिष्ठ इंजीनियरों की जांच रिपोर्ट में यह महत्वपूर्ण बिंदु उभरकर आया है कि ब्रिज के निर्माण के समय तकनीकी समन्वय का अभाव था, जिसके कारण परियोजना विवादों में घिरी। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि यदि निर्माण के समय उच्च स्तरीय पर्यवेक्षण बेहतर होता, तो इस डिजाइन को यात्रियों के लिए और अधिक सुरक्षित एवं सुलभ बनाया जा सकता था। इसके अतिरिक्त रेलवे क्षेत्र में वाल टाइप पिलर के निर्माण को भी एक गंभीर तकनीकी चूक माना गया है, जिसे भविष्य की परियोजनाओं के लिए एक सबक के तौर पर देखा जा रहा है ताकि इस तरह की संरचनात्मक विसंगतियों से बचा जा सके।

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