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    Gulf Crisis Impact: बहादुरगढ़ में जूता उद्योग का उत्पादन आधा

    बहादुरगढ़ फुटवियर उद्योग पर संकट: खाड़ी युद्ध के चलते उत्पादन गिरा आधा, 10 हजार करोड़ की चपत

    बहादुरगढ़। भारत का प्रमुख नॉन-लेदर फुटवियर केंद्र, बहादुरगढ़, इस समय अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। सालाना करीब 70 हजार करोड़ रुपये का कारोबार करने वाला यह उद्योग अंतरराष्ट्रीय तनाव और सप्लाई चेन में आई बाधाओं के कारण गंभीर संकट में है।

    उत्पादन की रफ्तार हुई धीमी

    बहादुरगढ़ में देश का लगभग 60 प्रतिशत नॉन-लेदर फुटवियर तैयार होता है, लेकिन मौजूदा हालात ने इसकी रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है:

    • आधा रह गया उत्पादन: सामान्य दिनों में यहाँ रोजाना एक से सवा करोड़ जोड़ी जूते-चप्पल बनते थे, जो अब घटकर मात्र 50 लाख जोड़ी रह गए हैं।

    • बंद पड़ी मशीनें: फैक्टरियों में काम ठप होने के कगार पर है। कई उद्यमियों को अपने प्लांट की आधी मशीनें बंद रखनी पड़ रही हैं।


    क्यों गहराया संकट?

    उद्योग विशेषज्ञों और फैक्ट्री मालिकों के अनुसार, इस मंदी के पीछे तीन मुख्य कारण हैं:

    1. सप्लाई चेन और कच्चा माल: युद्ध के कारण विदेशों से आने वाले कच्चे माल की आवक रुक गई है और तैयार माल भेजने के रास्ते प्रभावित हुए हैं।

    2. मजदूरों का पलायन: गैस की किल्लत और अनिश्चित भविष्य के डर से यहाँ काम करने वाले करीब 40 प्रतिशत श्रमिक अपने गांवों को लौट गए हैं।

    3. बढ़ती लागत: ऊर्जा संकट और कच्चे माल की महंगाई ने उत्पादन लागत को बढ़ा दिया है, जिससे हर रोज लाखों का घाटा हो रहा है।

    उद्यमियों का दर्द: रोज़ाना हो रहा लाखों का नुकसान

    • फुटवियर पार्क एसोसिएशन के वरिष्ठ उपप्रधान नरेंद्र छिकारा का कहना है कि एक महीने से अधिक समय से उत्पादन आधा रहने के कारण नुकसान का आंकड़ा 10 हजार करोड़ के पार पहुँच गया है। स्थिति सामान्य होने में अभी वक्त लगेगा।

    • उद्यमी मुकेश (MIE पार्ट-A): "जहाँ हम रोज़ाना 1,000 जोड़ी फुटवियर बनाते थे, अब 500 पर सिमट गए हैं। हर दिन 10 हजार रुपये का सीधा नुकसान हो रहा है।"

    • उद्यमी सुभाष जग्गा: "लेबर की भारी कमी है। उत्पादन 50% रह गया है और नुकसान लाखों में पहुँच रहा है।"


    भविष्य की अनिश्चितता

    बहादुरगढ़ में करीब 2,500 फैक्टरियां हैं, जिनसे ढाई से तीन लाख लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी है। जानकारों का मानना है कि अगर आज भी हालात सुधरते हैं, तो सप्लाई चेन को पटरी पर आने में कम से कम एक महीना लगेगा। वहीं, घर लौट चुके श्रमिकों की वापसी गर्मी के मौसम के बाद ही संभव लग रही है।

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