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    सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला केस की सुनवाई, याचिकाकर्ता से कड़ा सवाल

    नई दिल्ली: देश के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के अधिकार से जुड़ी कानूनी लड़ाई में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के नेतृत्व वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने इस मामले की शुरुआत करने वाले 'इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन' की मंशा और उनके कानूनी आधार पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। अदालत ने वर्ष 2006 में दायर की गई इस जनहित याचिका को कानून की उचित प्रक्रिया का दुरुपयोग करार देते हुए याचिकाकर्ता संगठन से पूछा कि आखिर उन्होंने किस हैसियत से यह मामला अदालत में पेश किया। पीठ ने स्पष्ट किया कि आस्था एक व्यक्तिगत विषय है और किसी कानूनी संस्था या संगठन के पास अपनी कोई अंतरात्मा नहीं होती जिसके आधार पर वह व्यक्तिगत विश्वास का दावा कर सके।

    संवैधानिक पीठ की तीखी फटकार और अधिकार क्षेत्र पर सवाल

    सुनवाई के दौरान संविधान पीठ के न्यायाधीशों ने याचिकाकर्ता संगठन को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि उन्हें जनहित याचिकाओं के खेल में पड़ने के बजाय युवा वकीलों के कल्याण और उनके करियर की बेहतरी के लिए काम करना चाहिए। जस्टिस बीवी नागरत्ना ने इस बात पर जोर दिया कि आस्था किसी व्यक्ति की निजी भावना होती है, जिसे कोई संस्था अपनी नहीं बता सकती। अदालत ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि यह याचिका केवल कुछ समाचारों के आधार पर दायर की गई थी, जबकि संगठन के पास इसे लेकर कोई ठोस औपचारिक प्रस्ताव तक नहीं था। न्यायाधीशों का मानना था कि ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले प्रतिभाशाली वकीलों को सहयोग देना इस संगठन का प्राथमिक उद्देश्य होना चाहिए था, न कि धार्मिक परंपराओं में इस तरह से हस्तक्षेप करना।

    याचिकाकर्ता की सफाई और तंत्री के मत का हवाला

    जवाब में याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को विश्वास दिलाने की कोशिश की कि उनका इरादा भगवान अयप्पा के भक्तों की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं था। उन्होंने दलील दी कि यह पूरी कानूनी कवायद 2006 की मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित थी और उनका लक्ष्य केवल न्यायसंगत व्यवस्था सुनिश्चित करना था। वकील ने मंदिर के मुख्य पुजारी के उस पुराने मत का भी उल्लेख किया जिसमें छोटी उम्र की महिलाओं के प्रवेश को देवता की मर्यादा के विपरीत बताया गया था। साथ ही, याचिकाकर्ता पक्ष ने नौ सदस्यीय पीठ के गठन के संदर्भ में कुछ जजों द्वारा की गई टिप्पणियों पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई और यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि वे केवल कानूनी और संवैधानिक पहलुओं को स्पष्ट करना चाहते थे।

    सबरीमाला विवाद का इतिहास और 2018 के फैसले का असर

    सबरीमाला का यह पूरा विवाद सदियों पुरानी उस परंपरा से जुड़ा है जिसमें 10 से 50 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाती थी, क्योंकि भगवान अयप्पा को एक नैष्ठिक ब्रह्मचारी माना जाता है। हालांकि, साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने बहुमत से इस पाबंदी को असंवैधानिक घोषित करते हुए महिलाओं के समानता के अधिकार को सर्वोपरि रखा था। उस ऐतिहासिक फैसले के बाद पूरे भारत में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं और परंपरावादियों ने इसे धर्म में अदालती दखल बताया। इसी असंतोष के कारण कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर हुईं, जिसके बाद अब नौ जजों की यह बड़ी पीठ धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के बीच की बारीक लकीर को स्पष्ट करने के लिए इस मामले का गहन विश्लेषण कर रही है।

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