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    बार-बार कर्ज लेने की सुविधा कैसे बन सकती है परेशानी, समझें रिवॉल्विंग क्रेडिट का गणित

    छोटे कारोबारियों को कार्यशील पूंजी (वर्किंग कैपिटल) की त्वरित आवश्यकता होती है—कच्चा माल क्रय करने, श्रमिकों की मजदूरी देने अथवा बिजली के बिलों का भुगतान करने हेतु। हालांकि, बिक्री का भुगतान 60 दिनों के उपरांत प्राप्त होता है। ऐसे में पांच वर्ष हेतु 20 लाख रुपये का एकमुश्त कर्ज लेने के स्थान पर कारोबारी 'रिवॉल्विंग क्रेडिट' (घूमती ऋण सुविधा) को अधिक प्राथमिकता देते हैं। इसमें आवश्यकतानुसार धन आहरित किया जाता है और भुगतान प्राप्त होते ही उसे पुनः जमा कर दिया जाता है, जिससे क्रेडिट सीमा पुनः उपलब्ध हो जाती है।

    भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) के ऋण उत्पादों के संदर्भ में एक मसौदा (ड्राफ्ट) जारी किया है, जिसमें सामान्य एनबीएफसी द्वारा ऐसी रिवॉल्विंग क्रेडिट सुविधा प्रदान करने पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव रखा गया है।

    व्यवसाय और उपभोक्ता: एक ही सुविधा के दो भिन्न पक्ष

    रिवॉल्विंग क्रेडिट का प्रभाव उपयोग के उद्देश्य पर निर्भर करता है:

    • कारोबारी परिदृश्य: व्यापारी स्वीकृत 10 लाख रुपये की ऋण सीमा में से आवश्यकतानुसार 4 लाख रुपये का उपयोग करता है और ग्राहक से भुगतान मिलते ही राशि जमा कर देता है। यह प्रक्रिया व्यापार के नकदी प्रवाह (कैश फ्लो) को सुचारू बनाए रखती है।

    • उपभोक्ता परिदृश्य: उपभोक्ताओं को त्वरित क्रेडिट सीमा (उदा. 2 लाख रुपये) का संदेश प्राप्त होता है। वेतन आने पर आंशिक भुगतान किया जाता है और पुनः सीमा का उपयोग कर लिया जाता है। यही स्थिति जोखिम उत्पन्न करती है, क्योंकि यह भविष्य की आय को वर्तमान में व्यय करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती है।

    टर्म लोन एवं रिवॉल्विंग क्रेडिट में अंतर

    • टर्म लोन: इसमें संपूर्ण ऋण राशि एक बार में स्वीकृत होती है। मूलधन, ब्याज दर और मासिक किश्तें (EMI) पूर्व निर्धारित होती हैं। किश्तों के भुगतान के साथ ऋण समाप्त होता जाता है।

    • रिवॉल्विंग क्रेडिट: इसमें एक अधिकतम ऋण सीमा तय की जाती है। ब्याज केवल उपयोग की गई राशि पर देय होता है। आंशिक या पूर्ण भुगतान के उपरांत स्वीकृत सीमा पुनः उपयोग हेतु उपलब्ध हो जाती है।

    भारतीय रिज़र्व बैंक की मुख्य चिंताएं

    आरबीआई का मुख्य उद्देश्य वास्तविक भुगतान क्षमता के छुपाव को रोकना है। यदि किसी ग्राहक की ऋण सीमा 5 लाख रुपये है और वह संपूर्ण सीमा का उपयोग करने के पश्चात केवल न्यूनतम देय राशि (मिनिमम ड्यू) जमा करता है, तो खाता कागजों पर सक्रिय (नॉन-डिफ़ॉल्ट) दिखता है, परंतु मूलधन कम नहीं होता। इससे उपभोक्ता दीर्घकालिक ऋण चक्र में फंस जाता है, जो वित्तीय प्रणाली के लिए जोखिम उत्पन्न करता है।

    वित्तीय जोखिम से बचाव के मुख्य उपाय

    • क्रेडिट सीमा को आय न समझें: स्वीकृत ऋण सीमा को व्यक्तिगत आय से पृथक रखें।

    • मूलधन की निरंतर निगरानी: यदि कई महीनों तक भुगतान के बाद भी मूलधन कम नहीं हो रहा है, तो यह वित्तीय संकट का संकेत है।

    • न्यूनतम भुगतान की आदत से बचें: केवल 'मिनिमम ड्यू' का भुगतान करने से ब्याज बढ़ता रहता है और कर्ज समाप्त नहीं होता।

    • व्यावसायिक एवं व्यक्तिगत व्यय का पृथक्करण: व्यापारिक आवश्यकताओं और व्यक्तिगत जीवनशैली के लिए लिए गए ऋणों को सदैव अलग रखें।

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