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    अमेरिका से नहीं डरा ईरान कहा- हम किसी भी देश के दबाव में आने वाले नहीं

    तेहरान। ओमान में अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधियों के बीच हुई हालिया बातचीत ने वैश्विक कूटनीति में एक नई हलचल पैदा कर दी है। हालांकि इस मुलाकात को एक अच्छी शुरुआत माना जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि दोनों देशों के बीच मतभेदों की खाई कम होने के बजाय और गहरी होती दिख रही है। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है। तेहरान ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि वह केवल परमाणु मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है और मिसाइल कार्यक्रम या क्षेत्रीय गुटों के समर्थन जैसे विषयों को बातचीत की मेज से पूरी तरह बाहर रखता है।
    ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कड़े लहजे में कहा कि यूरेनियम संवर्धन ईरान का अविभाज्य अधिकार है और यह प्रक्रिया किसी भी कीमत पर नहीं रुकेगी। उन्होंने अमेरिका को सीधी चेतावनी देते हुए कहा कि यदि ईरानी धरती पर किसी भी तरह का हमला हुआ, तो मध्य पूर्व में मौजूद सभी अमेरिकी सैन्य ठिकाने ईरान की मिसाइलों के निशाने पर होंगे। अराघची ने ओमान वार्ता को सकारात्मक बताते हुए अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल से शिष्टाचार भेंट की बात तो स्वीकार की, लेकिन साथ ही यह भी जोड़ा कि भरोसे की बहाली के लिए अभी एक बहुत लंबा रास्ता तय करना बाकी है। ईरान का मानना है कि समाधान केवल सम्मानजनक बातचीत से ही निकल सकता है, प्रतिबंधों या धमकियों से नहीं। दूसरी ओर, अमेरिका ने इस मामले में डबल गेम की नीति अपनाई है। एक तरफ जहां बातचीत को सफल बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नया कार्यकारी आदेश जारी कर ईरान पर आर्थिक शिकंजा और कस दिया है। इस आदेश के तहत ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर भारी टैरिफ और ईरान के तेल निर्यात में शामिल दर्जनों जहाजों व कंपनियों पर नए प्रतिबंध लगाए गए हैं। ट्रंप प्रशासन की ताकत के दम पर शांति की नीति के तहत अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर ने हाल ही में अरब सागर में तैनात विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन का दौरा कर अपनी सैन्य तैयारियों का प्रदर्शन भी किया। इस कूटनीतिक रस्साकशी के बीच इजरायल की चिंताएं चरम पर हैं। इजरायल चाहता है कि अमेरिका केवल परमाणु कार्यक्रम ही नहीं, बल्कि ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल नेटवर्क और हिजबुल्लाह व हमास जैसे गुटों को मिलने वाली मदद पर भी कड़ा रुख अपनाए। ईरान द्वारा इन मुद्दों पर बात करने से इनकार करने के बाद प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अपनी निर्धारित वाशिंगटन यात्रा को समय से पहले करने का निर्णय लिया है। नेतन्याहू अगले हफ्ते राष्ट्रपति ट्रंप से मुलाकात करेंगे, जहां उनके साथ इजरायली वायु सेना के भावी प्रमुख ब्रिगेडियर जनरल ओमर टिशलर भी होंगे। यह संकेत देता है कि इजरायल अब ईरान के खिलाफ किसी बड़े सैन्य विकल्प या अत्यंत कठोर प्रतिबंधों के लिए अमेरिका पर दबाव बना सकता है। फिलहाल, तेहरान की सड़कों पर आम लोगों के बीच इस बातचीत को लेकर बहुत अधिक उत्साह नहीं है। स्थानीय निवासियों का मानना है कि जब तक दोनों पक्ष अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े रहेंगे, तब तक किसी ठोस नतीजे पर पहुँचना नामुमकिन है। एक तरफ परमाणु संवर्धन की जिद और दूसरी तरफ प्रतिबंधों का पहाड़—इन दोनों के बीच मध्य पूर्व का भविष्य एक बार फिर अनिश्चितता और युद्ध के बादलों के बीच घिरा नजर आ रहा है।

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