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    दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति वाले इलाके में केजरीवाल की जीत, BJP को झटका

    नर्मदा | गुजरात के स्थानीय निकाय चुनावों में जहाँ भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने राज्य की सभी 15 नगर निगम सीटों पर क्लीन स्वीप कर अपना वर्चस्व कायम रखा है, वहीं आदिवासी बहुल नर्मदा जिले से आए नतीजों ने सत्ता के गलियारों में हलचल मचा दी है। 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' जैसे विश्व प्रसिद्ध स्थल वाले इस जिले में आम आदमी पार्टी (AAP) ने भाजपा को करारी शिकस्त देते हुए जिला पंचायत पर कब्जा कर लिया है।

    भाजपा के विजय रथ पर 'आप' का ब्रेक

    गुजरात की कुल 34 जिला पंचायतों में से 33 पर भाजपा ने जीत का परचम लहराया है, लेकिन नर्मदा जिला वह एकमात्र अपवाद रहा जहाँ भाजपा का 'परफेक्ट स्कोर' अधूरा रह गया।

    • जिला पंचायत: 'आप' ने 22 में से 15 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। गौर करने वाली बात यह है कि 2021 में यहाँ भाजपा के पास 19 सीटें थीं।

    • तालुका पंचायत: छह में से चार तालुका पंचायतों में भी 'आप' ने अपना वर्चस्व स्थापित किया है।

    चैतर वसावा का बढ़ता कद और 'डेडियपाड़ा' का क्लीन स्वीप

    इस बड़ी जीत का सेहरा आदिवासी नेता और विधायक चैतर वसावा के सिर बांधा जा रहा है। वसावा के व्यक्तिगत प्रभाव और उनके द्वारा उठाए गए जंगल-जमीन के अधिकारों के मुद्दों ने मतदाताओं को गहराई से प्रभावित किया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले साल उनकी गिरफ्तारी ने क्षेत्र में सहानुभूति की लहर पैदा की। इसी का नतीजा है कि डेडियपाड़ा विधानसभा क्षेत्र की सभी 11 जिला पंचायत सीटों पर 'आप' ने क्लीन स्वीप किया, जहाँ भाजपा का खाता भी नहीं खुल सका।

    आदिवासी राजनीति के नए समीकरण

    नर्मदा में भाजपा की हार की चर्चा अब उत्तर प्रदेश के अयोध्या से की जा रही है। जानकारों का कहना है कि जिस तरह अयोध्या में भव्य मंदिर के बावजूद भाजपा को संघर्ष करना पड़ा, ठीक उसी तरह नर्मदा में 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' जैसे विशाल विकास कार्यों के बावजूद स्थानीय आदिवासियों ने 'आप' की राजनीति पर भरोसा जताया है। यह जीत ऐसे समय में आई है जब आम आदमी पार्टी अपने शहरी गढ़ों (जैसे सूरत) में कमजोर हुई है, लेकिन ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में एक नई ताकत के रूप में उभरी है।

    शीर्ष नेतृत्व की प्रतिक्रिया

    आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने इस जीत को गुजरात में "बदलाव की नई शुरुआत" करार दिया है। वहीं, चैतर वसावा ने इसे ईमानदारी की राजनीति की जीत बताते हुए कहा कि यह केवल सीटों की संख्या नहीं, बल्कि जनता के अधिकारों की जीत है।

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