कांग्रेस पार्टी ने संसद के मानसून सत्र को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए जाने के बाद भी उसके औपचारिक रूप से सत्रावसान (समापन) में हो रही असामान्य देरी को लेकर केंद्र सरकार पर बड़ा हमला बोला है। मुख्य विपक्षी दल ने आरोप लगाया है कि सरकार संसद में परिसीमन से जुड़े अटके हुए संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के उद्देश्य से दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा जुटाने की जोड़-तोड़ में लगी हुई है।
29 दिनों का अंतर: सरकार ने तोड़ा अपना ही पिछला रिकॉर्ड
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि संसद को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए जाने और राष्ट्रपति द्वारा उसके औपचारिक सत्रावसान के बीच अब तक 29 दिनों का लंबा अंतर हो चुका है। उन्होंने कहा कि सरकार ने वर्ष 2015 के अपने ही 28 दिनों के अंतर वाले रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सामान्य तौर पर अनिश्चितकाल के लिए स्थगन और औपचारिक सत्रावसान के बीच केवल तीन से चार दिनों का ही समय लगता है।
विपक्षी दलों पर दबाव और जोड़-तोड़ का आरोप
जयराम रमेश ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर सीधा आरोप लगाते हुए कहा कि वे लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत जुटाने का प्रयास कर रहे हैं, क्योंकि वर्तमान में सरकार के पास पर्याप्त संख्या बल उपलब्ध नहीं है। उन्होंने दावा किया कि जिन तीन राजनीतिक दलों ने 17 अप्रैल 2026 को इस विधेयक के विरोध में मतदान किया था, उनमें पहले ही फूट डाली जा चुकी है। साथ ही अन्य दलों पर भी केंद्रीय एजेंसियों का डर दिखाकर और प्रलोभन देकर रुख बदलने का दबाव बनाया जा रहा है।
परिसीमन मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाने से क्यों बच रही है सरकार?
कांग्रेस नेता ने सवाल उठाया कि परिसीमन जैसे देश के मूल ढांचे से जुड़े संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय पर सरकार सर्वदलीय बैठक बुलाने से क्यों कतरा रही है। उन्होंने कहा कि मार्च 2026 से ही पूरा विपक्ष इस मुद्दे पर व्यापक सहमति बनाने के लिए सर्वदलीय बैठक की मांग कर रहा है। सरकार पर्दे के पीछे रणनीति बनाने में लगी है, लेकिन वह अनैतिक तरीकों से बहुमत हासिल करने में सफल नहीं होगी।
17 अप्रैल को लोकसभा में गिर गया था महत्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयक
उल्लेखनीय है कि 17 अप्रैल को बजट सत्र के दौरान लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिला आरक्षण के क्रियान्वयन के लिए आवश्यक परिसीमन से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक निचले सदन में पारित नहीं हो सका था। उस समय हुए मतदान में उपस्थित 528 सांसदों में से 298 ने विधेयक के समर्थन में और 230 ने इसके खिलाफ वोट दिया था। इस विधेयक को स्वीकृति दिलाने के लिए अनिवार्य दो-तिहाई बहुमत के तहत कम से कम 352 मतों की आवश्यकता थी, जिसके कारण सरकार को बड़ा झटका लगा था।


