मुंबई। शिवसेना (यूबीटी) ने महाराष्ट्र की मौजूदा महायुति सरकार की आर्थिक नीतियों पर तीखा हमला बोला है। पार्टी ने दावा किया है कि वार्षिक बजट पेश होने के मात्र तीन महीने के भीतर ही सरकार ने 97,706.40 करोड़ रुपये की भारी-भरकम पूरक मांगें (सप्लीमेंट्री डिमांड्स) विधानसभा में रख दी हैं। पार्टी के मुताबिक, इतनी जल्दी इतनी बड़ी रकम की अतिरिक्त मांग करना यह साफ दर्शाता है कि राज्य का वित्तीय अनुशासन और आर्थिक नियंत्रण पूरी तरह से लड़खड़ा चुका है।
पार्टी ने राज्य की आर्थिक स्थिति पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था इस समय बेहद नाजुक दौर से गुजर रही है। राज्य पर कुल सार्वजनिक कर्ज का बोझ बढ़कर लगभग 11 लाख करोड़ रुपये के करीब पहुंच गया है, जिसके चलते हर साल सिर्फ कर्ज का ब्याज चुकाने में ही सरकारी खजाने से 60,000 करोड़ रुपये की मोटी रकम खर्च हो रही है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार बिना किसी दूरदर्शी नीति के राजकोष से पैसा बहा रही है।
पूरक मांगों का नया रिकॉर्ड और बजट अनुमानों की नाकामी
पार्टी ने सरकार की इस कार्यप्रणाली की तुलना उस विद्यार्थी से की है जो परीक्षा में बार-बार सप्लीमेंट्री कॉपियां तो लेता है, लेकिन अंत में जैसे-तैसे केवल पासिंग मार्क्स ही ला पाता है। शिवसेना (यूबीटी) का कहना है कि मुख्य बजट के तुरंत बाद इतनी बड़ी धनराशि की मांग करना प्रशासनिक नाकामी को दर्शाता है। पिछले चार सालों के दौरान महायुति सरकार ने कुल मिलाकर करीब पांच लाख करोड़ रुपये की पूरक मांगें पेश की हैं, जो बजट से इतर खर्च करने का एक नया रिकॉर्ड है। अभी आगामी बजट में नौ महीने का समय शेष है, लेकिन सरकार के राजस्व और खर्च के शुरुआती सारे आकलन पहले तीन महीनों में ही पूरी तरह बेअसर साबित हो गए हैं।
विपक्ष में कुछ और, सत्ता में आकर बदले सुर
पार्टी ने पुराने राजनीतिक घटनाक्रमों का हवाला देते हुए याद दिलाया कि जब राज्य में महा विकास अघाड़ी (एमवीए) की सरकार सत्ता में थी, तब आज के सत्ताधारी दल विपक्ष की भूमिका में हुआ करते थे। उस दौर में ये नेता बहुत कम राशि की पूरक मांगें लाने पर भी तत्कालीन सरकार की जमकर घेराबंदी करते थे और उसे वित्तीय कुप्रबंधन का नाम देते थे। आज वही चेहरे मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री जैसे जिम्मेदार पदों पर आसीन हैं, लेकिन अब उन्हें पांच लाख करोड़ रुपये से अधिक की ये पूरक मांगें वित्तीय अनुशासनहीनता नहीं लगतीं। राजनीतिक लाभ के लिए मुख्य बजट में वास्तविक आवंटन को छिपाना और बाद में चोर दरवाजे से धन राशि मांगना अब सरकार की आदत बन चुका है।
आर्थिक विरासत और साख को लगा बड़ा बट्टा
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले दल ने तंज कसते हुए कहा कि यह सरकार जनकल्याण के बजाय केवल राजनीतिक लाभ वाले अनुत्पादक कार्यों पर अंधाधुंध पैसा लुटा रही है, जिसने राज्य की पूरी वित्तीय योजना को पटरी से उतार दिया है। महाराष्ट्र कभी देश और दुनिया में अपने बेहतरीन वित्तीय अनुशासन, पारदर्शी नीतियों और मजबूत आर्थिक विरासत के लिए जाना जाता था। पिछले चार वर्षों के दौरान सरकार की खर्चीली और अदूरदर्शी नीतियों के कारण राज्य की वह पुरानी साख और ईमानदारी का सम्मान पूरी तरह धूमिल हो गया है।


