रियाद। मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और हमलों के कारण वैश्विक ऊर्जा संकट गहराने का बड़ा खतरा पैदा हो गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान के बीच अब सऊदी अरब ने इराकी क्षेत्र से हुए ड्रोन हमलों के बाद अपनी मुख्य कच्चे तेल की पाइपलाइन को एहतियातन बंद कर दिया है। इसके अलावा, यमन के लाल सागर तट पर 18 घंटे तक चली भीषण जंग के बाद हूती विद्रोही बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य पर कब्जा करने के करीब पहुंच गए हैं।
वैश्विक तेल आपूर्ति के 3 सबसे बड़े रास्ते संकट में
कच्चे तेल और गैस के परिवहन के लिए ये तीनों जलमार्ग और पाइपलाइन दुनिया की लाइफलाइन माने जाते हैं:
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज: वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे जलमार्ग से गुजरता है।
सऊदी पाइपलाइन: इस ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के जरिए रोजाना 40 से 50 लाख बैरल तेल की आपूर्ति होती है।
बाब अल-मंडेब: इस समुद्री मार्ग से दुनिया के कुल समुद्री तेल-गैस व्यापार का 5 से 12 प्रतिशत (लगभग 40 से 50 लाख बैरल प्रतिदिन) परिवहन होता है।
30 फीसदी वैश्विक तेल सप्लाई ठप होने का खतरा
यदि ये तीनों प्रमुख मार्ग पूरी तरह अवरुद्ध हो जाते हैं, तो दुनिया भर की लगभग 30 प्रतिशत ऊर्जा आपूर्ति ठप पड़ जाएगी। ईरान और क्षेत्रीय संकट के कारण मिडिल ईस्ट से निकलने वाली तेल और गैस की खेप पूरी तरह बाधित हो सकती है। इसका सबसे बुरा असर भारत, चीन और यूरोपीय देशों पर पड़ेगा, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इन मार्गों पर अत्यधिक निर्भर हैं।
भारत और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर
यदि यह संकट लंबा खिंचता है, तो इसके गंभीर आर्थिक परिणाम देखने को मिल सकते हैं:
महंगाई में उछाल: पेट्रोल, डीजल और एलपीजी (LPG) के दामों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी होगी।
सप्लाई चेन प्रभावित: अंतरराष्ट्रीय माल ढुलाई महंगी होने से दैनिक उपयोग की वस्तुएं और कच्चा माल महंगा हो जाएगा।
निर्यात और अर्थव्यवस्था पर मार: भारत से अन्य देशों को होने वाला निर्यात प्रभावित होगा, जिससे औद्योगिक लागत बढ़ेगी, बाजार में मांग घटेगी और वैश्विक अर्थव्यवस्था सुस्ती की चपेट में आ जाएगी।


