काठमांडू। नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद भारत से आर्थिक मुआवजे की मांग वाली खबरों पर नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने कहा कि नेपाल ने भारत, चीन या अमेरिका किसी भी देश से किसी तरह के मुआवजे की मांग नहीं की है। उनकी अपील केवल जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को मिलकर समझने और इसके समाधान के लिए क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने की है।
आपदा राहत में भारत के सहयोग की सराहना
विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने भीषण तबाही के तुरंत बाद भारत द्वारा दी गई त्वरित मदद की सराहना की। उन्होंने बताया कि भारत शुरुआती समय से ही काठमांडू के साथ संपर्क में रहा और हरसंभव सहायता उपलब्ध कराई। भारत ने अब तक पांच विमानों के जरिए अस्थायी आश्रय, टेंट, कंबल, जनरेटर, सोलर लैंप, पानी निकालने के पंप, चिकित्सा सामग्री और भोजन सामग्री सहित भारी मात्रा में राहत सामग्री भेजी है।
फोरेंसिक टीम और राहत सामग्री की कई खेपें पहुंचाई गईं
आपदा के बाद भारत ने 10 टन की पहली खेप 26 अगस्त को भेजी थी, जिसके बाद 37.5 टन और 10 टन की अतिरिक्त राहत सामग्रियां नेपाल पहुंचीं। इसके अलावा, भारत ने बुधवार को 11 सदस्यीय बचाव दल, विशेष उपकरण और 5.5 टन दवाओं के साथ पांचवां विमान भेजा। लापता लोगों और शवों की पहचान की चुनौती से निपटने के लिए भारत ने फोरेंसिक सहायता भी प्रदान की है। दोनों देश लगातार संपर्क में हैं और आवश्यकतानुसार सहायता जुटाई जा रही है।
नेपाल में भारी तबाही और दीर्घकालिक तैयारी की जरूरत
नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार, रासुवा क्षेत्र में आई इस आपदा में मरने वालों का आंकड़ा 1,282 तक पहुंच गया है। विदेश मंत्री खनाल ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र में भारत, नेपाल और चीन के पर्यावरण एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। केवल तात्कालिक राहत ही काफी नहीं है, बल्कि बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों से निपटने के लिए तीनों देशों को दीर्घकालिक रणनीति और बेहतर क्षेत्रीय सहयोग पर काम करना होगा।


