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    कावेरी विवाद सुलझाने की नई पहल, 30 साल बाद दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक संभव

    चेन्नई। कावेरी नदी के जल बंटवारे को लेकर जारी गतिरोध के बीच तमिलनाडु और कर्नाटक के मुख्यमंत्रियों के बीच प्रस्तावित बैठक को लेकर कूटनीतिक सुगबुगाहट तेज हो गई है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय और कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के मध्य संभावित सीधी वार्ता राजनीतिक गलियारों में गहरी चर्चा का विषय बनी हुई है। तमिलनाडु के पारंपरिक प्रशासनिक रुख से हटकर सीएम विजय का यह कदम दशकों पुरानी नीति में बड़े बदलाव का संकेत देता है, जहाँ राज्य हमेशा द्विपक्षीय वार्ताओं के बजाय अदालती फैसलों और ट्रिब्यूनल पर ही आश्रित रहा है।

    दशकों पुरानी परंपरा से अलग राह

    तमिलनाडु में पिछले करीब तीन दशकों से यह माना जाता रहा है कि कावेरी जैसा संवेदनशील विषय इतिहास, कृषि और जनभावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसलिए इस विवाद को केवल कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) के नियमों, ट्रिब्यूनल के आदेशों और सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के माध्यम से ही निपटाया जाना चाहिए। इसके विपरीत, मौजूदा मुख्यमंत्री अपने कानूनी अधिकारों से समझौता किए बिना बातचीत का ऐसा नया मार्ग खोलना चाहते हैं, जिससे आपात स्थितियों में भी राज्य को पानी की निर्बाध आपूर्ति मिलती रहे। यदि 31 जुलाई से 3 अगस्त के मध्य यह वार्ता संभव होती है, तो बीते 14 वर्षों में यह पहला अवसर होगा जब दोनों राज्यों के शीर्ष नेता इस मुद्दे पर आमने-सामने बैठकर संवाद करेंगे।

    डेल्टा क्षेत्र में गहराया जल संकट

    इस कूटनीतिक पहल का मुख्य कारण कावेरी डेल्टा क्षेत्र में फसलों पर मंडराता गंभीर संकट है। निर्धारित मानकों के अनुसार 1 जून से 23 जुलाई के बीच तमिलनाडु को लगभग 32 हजार मिलियन क्यूबिक फीट (TMC) पानी मिलना चाहिए था, किंतु उसे मात्र 3.5 TMC पानी ही प्राप्त हो सका है। कमजोर मॉनसून के बावजूद तमिलनाडु का तर्क है कि कर्नाटक को राहत के तौर पर तुरंत अतिरिक्त जल प्रवाहित करना चाहिए था। पानी की इस भारी किल्लत से खेतों में लहलहाती फसलें सूखने की कगार पर पहुँच गई हैं, जिससे स्थानीय किसान चिंतित हैं।

    आशंकाएँ और राजनीतिक परीक्षा

    मुख्यमंत्रियों की इस सीधी बातचीत पर विपक्षी समूहों और किसान संगठनों ने कुछ सवाल भी खड़े किए हैं। आलोचकों को अंदेशा है कि ऐसी द्विपक्षीय वार्ताओं से जल प्रबंधन प्राधिकरण की महत्ता कम हो सकती है या कर्नाटक पानी छोड़ने की शर्त पर मेकेदातु बांध परियोजना से विरोध हटाने का दबाव बना सकता है। पूर्व न्यायिक विशेषज्ञों का मानना है कि आपसी संवाद से सौहार्दपूर्ण माहौल अवश्य बन सकता है, लेकिन यह कानूनी अधिकारों का विकल्प नहीं हो सकता। यदि मुख्यमंत्री विजय मेकेदातु मुद्दे पर राज्य के रुख को कायम रखते हुए तुरंत कावेरी का पानी लाने में सफल रहते हैं, तो इसे उनकी बड़ी रणनीतिक सफलता माना जाएगा।

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