नई दिल्ली। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े घटनाक्रम और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर केंद्र सरकार पर तीखे सवाल उठाए हैं। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े मौजूदा कानून को तत्काल रद्द करने की मांग करते हुए कहा है कि इस कानून की वजह से चुनाव आयोग की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर गंभीर असर पड़ रहा है।
नियुक्ति प्रक्रिया और कानूनी सुरक्षा पर आपत्ति
असदुद्दीन ओवैसी ने याद दिलाया कि जब यह विधेयक लोकसभा में पेश किया गया था, तभी उन्होंने चेतावनी दी थी कि इसके प्रावधान जनता के बीच निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता को कम कर देंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि इस कानून में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को सेवानिवृत्ति के बाद कानूनी संरक्षण प्रदान करने का प्रावधान किया गया है, जिसे बदला जाना चाहिए। उन्होंने मांग की कि चयन समिति में प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता के साथ-साथ भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को भी शामिल किया जाना चाहिए, ताकि यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी बन सके।
एसआईआर और 10 करोड़ नाम हटाने पर सवाल
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर कड़ा एतराज जताते हुए ओवैसी ने सवाल किया कि आखिर यह प्रक्रिया कहां से अस्तित्व में आई है। उन्होंने दावा किया कि इसके तहत अब तक 10 करोड़ नाम हटाए जा चुके हैं, और इसके बावजूद फॉर्म-6 के आवेदनों की प्रक्रिया के दौरान आवेदकों की मैपिंग पर अनावश्यक जोर दिया जा रहा है। उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया को तत्काल बंद करने की मांग की है।
इंडिया ब्लॉक के प्रदर्शन और सीजेआई से मुलाकात पर बयान
इंडिया ब्लॉक के विरोध प्रदर्शन के सवाल पर ओवैसी ने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध जताना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है और देश का सर्वोच्च न्यायालय भी इसकी पुष्टि कर चुका है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि वे इंडिया ब्लॉक का हिस्सा नहीं हैं, इसलिए इसके कार्यक्रमों पर टिप्पणी करना उचित नहीं है। इसके अलावा, विपक्षी गठबंधन द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात करने की पहल पर उन्होंने शक्तियों के पृथक्करण (डॉक्ट्रिन ऑफ सेपरेशन ऑफ पावर्स) का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि सांसद होने के नाते वे स्वयं विधायिका का हिस्सा हैं और यदि उन्हें कोई शिकायत है, तो उसकी सीधी जवाबदेही कार्यपालिका यानी प्रधानमंत्री से है। उन्होंने सवाल उठाया कि सांसद मुख्य न्यायाधीश से कैसे मुलाकात कर सकते हैं। ओवैसी ने याद दिलाया कि कुछ समय पहले 'वन नेशन, वन इलेक्शन' से संबंधित संसदीय स्थायी समिति के सुप्रीम कोर्ट से मिलने के प्रयास के दौरान भी उन्होंने इसी सिद्धांत के तहत सवाल उठाए थे, क्योंकि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका स्वतंत्र संस्थाएं हैं और इनके बीच की लक्ष्मण रेखा का हमेशा सम्मान होना चाहिए।


