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    11 मई को सोमनाथ जाएंगे पीएम मोदी, यात्रा को लेकर कही बड़ी बात

    नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 मई को अपनी सोमनाथ यात्रा के उपलक्ष्य में एक विशेष लेख साझा किया है, जिसमें उन्होंने इस पावन तीर्थ को भारत की अखंड चेतना और स्वाभिमान का प्रतीक बताया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर इस लेख की जानकारी देते हुए प्रधानमंत्री ने उन सभी पूर्वजों और वीरों को नमन किया, जिन्होंने अनगिनत हमलों और चुनौतियों के बावजूद सोमनाथ मंदिर की गरिमा को बचाए रखा और इसके पुनर्निर्माण में अपना जीवन समर्पित कर दिया।

    सोमनाथ: भारत की अविनाशी चेतना का प्रतीक

    प्रधानमंत्री ने अपने लेख में उल्लेख किया कि सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की उस अटूट शक्ति का उदाहरण है जिसे कभी मिटाया नहीं जा सका। उन्होंने वर्ष 2026 की शुरुआत में मनाए गए "सोमनाथ स्वाभिमान पर्व" का स्मरण करते हुए कहा कि मंदिर पर हुए पहले आक्रमण के एक हजार साल बाद आज इसकी भव्यता भारत के संकल्प की जीत है। पीएम के अनुसार, मंदिर के पुनर्निर्माण की 75वीं वर्षगांठ देश की उस सांस्कृतिक निरंतरता का उत्सव है, जो हर विध्वंस के बाद और अधिक शक्ति के साथ पुनर्जीवित हुई है।

    राष्ट्रनायकों और ऐतिहासिक योद्धाओं को श्रद्धांजलि

    अपने लेख में पीएम मोदी ने सोमनाथ की रक्षा करने वाले राजा भोज, अहिल्याबाई होल्कर और वीर हमीरजी गोहिल जैसे महान योद्धाओं के योगदान को भावुकता से याद किया। उन्होंने विशेष रूप से लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के उस दृढ़ संकल्प का जिक्र किया, जिसके तहत 13 नवंबर 1947 को मंदिर के भव्य पुनर्निर्माण का प्रण लिया गया था। केएम मुंशी के प्रयासों और 1951 में प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा किए गए लोकार्पण को याद करते हुए उन्होंने इसे आधुनिक भारत के निर्माण का एक महत्वपूर्ण अध्याय बताया।

    विरासत के साथ आधुनिक विकास का संगम

    प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि पिछले दस वर्षों में केंद्र सरकार ने "विकास भी, विरासत भी" के सिद्धांत को सर्वोपरि रखा है। देश के प्रमुख आध्यात्मिक केंद्रों को आधुनिक सुविधाओं से जोड़ने के परिणामस्वरूप न केवल पर्यटन को बढ़ावा मिला है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय एकता भी सुदृढ़ हुई है। उन्होंने देशवासियों से सोमनाथ धाम आने का आग्रह करते हुए कहा कि यहाँ की समुद्री लहरें सदियों से यह संदेश दे रही हैं कि आस्था और मानवीय चेतना को लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता।

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