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    आत्महत्या रोकने की पहल पर CRPF से सवाल, क्या जवानों की आवाज भी समूह में होनी चाहिए?

    नई दिल्ली: देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' (CRPF) में कर्मियों द्वारा तनाव के चलते खुद को नुकसान पहुँचाने या साथियों पर फायरिंग जैसी दुखद घटनाओं को रोकने के लिए डीजी जीपी सिंह की अध्यक्षता में हाल ही में एक विशेष कोर ग्रुप का गठन किया गया है। हालांकि, इस कमेटी के गठन के बाद से ही इस पर कई तरह के सवाल उठने शुरू हो गए हैं। 'अलायंस ऑफ ऑल एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेस वेलफेयर एसोसिएशन' के महासचिव रणबीर सिंह ने आपत्ति जताते हुए कहा है कि इस कोर ग्रुप से कंपनी और बटालियन स्तर के अधिकारियों (जैसे सहायक कमांडेंट, डिप्टी कमांडेंट, टूआईसी और यूनिट कमांडेंट) को पूरी तरह बाहर रखा गया है। जमीनी हकीकत से वाकिफ ये कैडर अधिकारी ही सबसे बेहतर राय दे सकते हैं, क्योंकि वे सीधे जवानों के बीच रहते हैं। दैनिक जीवन की कठिनाइयों और मानसिक तनाव को सब-इंस्पेक्टर या इंस्पेक्टर स्तर के अफसर से बेहतर कोई नहीं समझ सकता।

    कोर ग्रुप की संरचना और कार्यप्रणाली

    इस कोर ग्रुप में डीजी के अलावा 9 अन्य वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं, जिनमें बल मुख्यालय में कार्यरत डीआईजी (कल्याण) को इसका संयोजक बनाया गया है। इसके अलावा एसडीजी (ऑपरेशन्स), एसडीजी (प्रशासन), एडीजी (मुख्यालय), आईजी (ऑपरेशन्स), आईजी (कार्मिक), आईजी (प्रशासन), आईजी (चिकित्सा), डीआईजी (ओपीएस-2) और डीआईजी (कल्याण) इस समिति का हिस्सा हैं। नियमानुसार, यह कोर ग्रुप हर महीने सीआरपीएफ मुख्यालय में बैठक करेगा और ऐसी घटनाओं की गहन समीक्षा कर उपाय सुझाएगा। हालांकि, इसमें कमांडेंट और उससे निचले रैंक के किसी भी प्रतिनिधि को शामिल नहीं किया गया है।

    सुरक्षा बलों के लिए शर्म की बात है आत्महत्याएं: पूर्व अधिकारी

    बीएसएफ के पूर्व अधिकारी आरसी शर्मा का कहना है कि सुरक्षा बलों के भीतर होने वाली आत्महत्याएं बेहद चिंताजनक और शर्म की बात है। गृह मंत्रालय की पहले की उच्चस्तरीय समितियों से कुछ खास हासिल नहीं हुआ है। गतिरोध, आपसी हत्याएं, सेवा शर्तें, नकारात्मक सामाजिक परिस्थितियाँ, अस्थिर पारिवारिक जीवन, प्रशिक्षण की खामियाँ, पुलिस संस्कृति, अधिकारियों के बीच संवाद की कमी और वित्तीय असुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों पर खुलकर बात करने की जरूरत है। जब तक जवानों के साथ वास्तविक संवाद स्थापित नहीं होगा और उन्हें अपने मन की बात खुलकर कहने का अवसर नहीं मिलेगा, तब तक इस समस्या की जड़ तक पहुँचना असंभव है।

    महज दिखावा बनकर न रह जाए कोर ग्रुप

    सीआरपीएफ से जुड़े मौजूदा और पूर्व अधिकारियों का मानना है कि केवल कागजी कल्याणकारी योजनाएं या मेडिकल जाँच से बात नहीं बनेगी। कोर ग्रुप को इस बात की गहराई से पड़ताल करनी होगी कि बल के जवान आखिर इतने तनाव और निराशा में क्यों हैं कि उन्हें चरम कदम उठाना पड़ रहा है। हर बार ऐसी घटनाओं को व्यक्तिगत कारणों से जोड़कर मुख्य मुद्दों से पल्ला झाड़ लिया जाता है।

    वर्तमान में ड्यूटी और जीवनचर्या का संतुलन, काम करने की कठिन परिस्थितियाँ, पर्याप्त आराम का समय और परिवार का साथ जैसी बुनियादी बातों पर किसी का ध्यान नहीं है। बल के शीर्ष अधिकारियों को यह समझने की जरूरत है कि सैनिक सम्मेलन में अल्पाहार या अन्य दिखावटी चीजें बाँट देना ही 'कल्याण' नहीं है। कई बार वरिष्ठों का अपमानजनक व्यवहार भी जवानों के लिए घातक साबित होता है।

    'खानाबदोश' जैसा जीवन जीने को मजबूर जवान

    पूर्व अधिकारियों के अनुसार, सीआरपीएफ के जवान एक खानाबदोश की तरह जीवन बिता रहे हैं। लगातार लंबी ड्यूटी और कठिन इलाकों में तैनाती के कारण उनके पास परिवार और सामाजिक जिम्मेदारियों के लिए समय ही नहीं बचता।

    • सुकमा या बीजापुर जैसे नक्सल प्रभावित और जोखिम भरे इलाकों में खून-पसीना बहाकर लौटने वाले जवान जब आरएएफ या किसी अन्य 'स्थायी' पोस्टिंग पर जाते हैं, तो उन्हें उम्मीद होती है कि वे परिवार के साथ कुछ सुकून के पल बिता सकेंगे।

    • लेकिन कई बार उन्हें तुरंत मणिपुर, दिल्ली के प्रदर्शन या चुनावी ड्यूटी जैसे अभियानों में भेज दिया जाता है।

    • अंततः जब वे बेस लौटते हैं, तब तक ट्रांसफर के नए आदेश आ जाते हैं।

    समस्या की जड़ तक जाने के लिए इन बदलावों की जरूरत

    • कामकाजी संस्कृति में सुधार: थकान, परिवार से लंबी दूरी और अनिश्चितता को 'सामान्य' मानना बंद करना होगा।

    • बटालियन संख्या में वृद्धि: बटालियनों की संख्या बढ़ाई जाए ताकि जवानों को उचित रोटेशन और पर्याप्त आराम मिल सके।

    • पारिवारिक स्थिरता: कम से कम तीन साल की ड्यूटी के बाद तीन साल परिवार के साथ रहने की ठोस नीति बने।

    • बेहतर एचआरए (HRA): महानगरों में रहने वाले जवानों को सम्मानजनक जीवन जीने लायक मकान किराया भत्ता मिले, ताकि उनके परिवार खराब इलाकों में रहने को मजबूर न हों।

    • मैदानी अनुभव वाले अफसर: कोर ग्रुप में ऐसे अधिकारियों को स्थान दिया जाए जिन्होंने मैदानी स्तर पर जवानों के साथ रातें बिताई हों और फील्ड ऑपरेशन का जमीनी अनुभव रखते हों।

    कोर ग्रुप की जिम्मेदारी और समीक्षा प्रक्रिया

    यह कोर ग्रुप हर महीने के तीसरे सप्ताह में बैठक कर पिछले महीने खुद को नुकसान पहुँचाने वाली घटनाओं की विस्तृत समीक्षा करेगा। इसमें घटना के कारणों, परिस्थितियों, चिकित्सा और मनोवैज्ञानिक सहायता की उपलब्धता तथा रोकथाम के उपायों का आकलन किया जाएगा। संबंधित यूनिट के कमांडेंट ऑनलाइन माध्यम से घटना की पूरी पृष्ठभूमि, यूनिट द्वारा की गई कार्रवाई और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए उठाए गए कदमों की रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे, ताकि बल स्तर पर कड़े और प्रभावी संस्थागत कदम उठाए जा सकें।

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