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    नाबालिग के हाथ में गाड़ी देने का खामियाजा, रेलवे कर्मचारी की जान गई; मां को 38 लाख का मुआवजा

    ठाणे| आज से छह साल पहले एक सड़क हादसे में अपनी जान गंवाने वाले रेलवे कर्मचारी के परिवार को आखिरकार न्याय मिल गया है। ठाणे मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (MACT) ने 25 वर्षीय धीरज शरद पवार की सड़क दुर्घटना में हुई मौत के मामले में उनकी मां को 38.13 लाख रुपये का मुआवजा प्रदान करने का महत्वपूर्ण आदेश दिया है। ट्रिब्यूनल ने अपनी सुनवाई में स्पष्ट रूप से माना कि यह हादसा पीछे से आ रही एक अन्य बाइक के नाबालिग चालक की भारी लापरवाही और अत्यधिक तेज रफ्तार के कारण हुआ था। इसके साथ ही, दुर्घटना के लिए मृतक को ही किसी भी प्रकार से जिम्मेदार ठहराने की बीमा कंपनी की दलील को पूरी तरह से खारिज कर दिया गया।

    बीमा कंपनी पहले चुकाएगी मुआवजा, बाद में वाहन मालिक से होगी वसूली

    MACT के सदस्य आर. वी. मोहिते ने शनिवार को अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि जिस मोटरसाइकिल से यह दुर्घटना हुई थी, उसकी संबंधित बीमा कंपनी सबसे पहले पीड़ित परिवार को मुआवजे की संपूर्ण राशि अदा करेगी। इसके पश्चात, बीमा कंपनी को यह कानूनी अधिकार होगा कि वह इस पूरी रकम की वसूली वाहन मालिक से कर सके। इस निर्णय का मुख्य आधार यह था कि दुर्घटना के समय बाइक एक ऐसे नाबालिग के हाथों में थी, जिसके पास वाहन चलाने के लिए कोई वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था। इसे बीमा पॉलिसी के नियमों और शर्तों का सीधा उल्लंघन माना गया है।

    8 जून 2020 को सड़क पर हुआ था दर्दनाक हादसा

    प्राप्त विवरण के अनुसार, 25 वर्षीय धीरज शरद पवार मुंबई के सेंट्रल रेलवे लोको वर्कशॉप में खलासी (हेल्पर) के पद पर अपनी सेवाएं दे रहा था। घटना 8 जून 2020 की है, जब वह अपनी मोटरसाइकिल से नालासोपारा रेलवे स्टेशन की तरफ जा रहा था। जाँच में यह बात सामने आई कि वह पूरी सावधानी के साथ अपनी बाइक सामान्य गति से चला रहा था। इसी दौरान, पीछे से अत्यंत तेज गति और लापरवाही से आई एक अन्य बाइक ने उसकी गाड़ी को पीछे से जोरदार टक्कर मार दी।

    अस्पताल पहुँचने से पहले ही हो चुकी थी मौत

    यह टक्कर इतनी भीषण थी कि धीरज को गंभीर आंतरिक और बाहरी चोटें आईं। दुर्घटना के तुरंत बाद उसे स्थानीय नालासोपारा के पब्लिक हेल्थ सेंटर ले जाया गया, जहाँ चिकित्सकों ने परीक्षण के बाद उसे मृत घोषित कर दिया। इस दुखद हादसे के बाद तुलिंज पुलिस थाने में शुरुआत में एक अज्ञात मोटरसाइकिल चालक के खिलाफ मामला दर्ज कर जाँच शुरू की गई थी।

    पुलिस जाँच में सामने आया नाबालिग चालक का सच

    जब पुलिस ने इस मामले में अपनी तफ्तीश आगे बढ़ाई, तो दुर्घटना के लिए जिम्मेदार बाइक और उसके असली चालक की शिनाख्त हो गई। वाहन चलाने वाला व्यक्ति एक नाबालिग निकला। इस मामले में जनवरी 2021 में भिवंडी के किशोर न्याय बोर्ड (Juvenile Justice Board) के समक्ष उस नाबालिग ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था, जिसके बाद बोर्ड ने उस पर 5,000 रुपये का आर्थिक जुर्माना भी लगाया था।

    न्याय की आस में मां ने खटखटाया न्यायाधिकरण का दरवाजा

    अपने जवान बेटे की अकाल मृत्यु के बाद उसकी बेसहारा मां ने मुआवजे की मांग को लेकर MACT में औपचारिक याचिका दायर की। कानूनी सुनवाई की प्रक्रिया के दौरान बाइक का मूल मालिक ट्रिब्यूनल के समक्ष कभी पेश नहीं हुआ, जिसके चलते उसके खिलाफ एकतरफा कार्रवाई (एक्स-पार्टी) की गई।

    बीमा कंपनी ने उठाया 'हिट एंड रन' का सवाल

    दूसरी तरफ, दुर्घटनाग्रस्त बाइक की बीमा कंपनी ट्रिब्यूनल की अदालत में पेश हुई। कंपनी ने अपनी दलील में दावा किया कि यह मामला मूल रूप से 'हिट एंड रन' का है। इसके साथ ही कंपनी ने यह भी तर्क दिया कि बाइक चलाने वाला नाबालिग वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं रखता था, इसलिए यह बीमा पॉलिसी की शर्तों का जानबूझकर किया गया गंभीर उल्लंघन है।

    24,712 रुपये मासिक आय मानकर तय हुआ मुआवजा

    दोनों पक्षों की दलीलों, साक्ष्यों और मामले के तमाम दस्तावेजों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद ट्रिब्यूनल ने मृतक धीरज की शुद्ध मासिक आय 24,712 रुपये निर्धारित की। इसी वित्तीय आधार पर उसकी मां को कुल 38.13 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश जारी किया गया। इस पूरी मुआवजा राशि पर याचिका दायर करने की प्रारंभिक तिथि से लेकर भुगतान तक 9 प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज भी देय होगा।

    एक महीने के भीतर जमा करनी होगी पूरी मुआवजा राशि

    ट्रिब्यूनल ने बीमा कंपनी को सख्त निर्देश दिए हैं कि वह आगामी एक महीने के भीतर मुआवजे की संपूर्ण राशि ब्याज सहित MACT के आधिकारिक बैंक खाते में जमा करे। इसके उपरांत यह राशि नियमानुसार उसकी मां को हस्तांतरित की जाएगी। ट्रिब्यूनल ने मुआवजे की इस बड़ी रकम के सदुपयोग के संबंध में भी स्पष्ट निर्देश दिए हैं; कुल 38.13 लाख रुपये में से 9 लाख रुपये की राशि किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में मां के नाम पर तीन साल की अवधि के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) के रूप में निवेश की जाएगी, जबकि शेष बची हुई राशि सीधे उनके बैंक खाते में ट्रांसफर कर दी जाएगी।

    नाबालिग की गलती और वाहन मालिक की बड़ी जिम्मेदारी

    ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले के अंत में यह बिल्कुल साफ कर दिया कि भले ही बीमा कंपनी को शुरुआत में पीड़ित परिवार को मुआवजा देना होगा, लेकिन वह बाद में इस धनराशि को वाहन मालिक से वसूलने का कानूनी हक रखती है। इसका मतलब यह है कि बिना वैध लाइसेंस के एक नाबालिग को वाहन सौंपने और सड़क पर उतारने की मूल जिम्मेदारी अंततः वाहन मालिक की ही बनती है। इस प्रकार, छह साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार इस सड़क हादसे में मृतक की मां को 38.13 लाख रुपये का मुआवजा मिलने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

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