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    प्रमोशन का मौका घटना मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

    बिलासपुर: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने राज्य की बिजली पावर कंपनियों में पदोन्नति कोटे में संशोधन को चुनौती देने वाली जूनियर इंजीनियरों (JE) की रिट याचिका को निरस्त कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि विभाग की कार्यप्रणाली, प्रशासनिक पुनर्गठन और भावी परियोजनाओं की आवश्यकताओं के अनुरूप भर्ती या पदोन्नति का कोटा तय करना नियोक्ता (प्रशासन) का नीतिगत विशेषाधिकार है। इसमें अदालत तब तक हस्तक्षेप नहीं कर सकती जब तक कि फैसला असंवैधानिक न हो।

    जानिए क्या है पूरा मामला?

    छत्तीसगढ़ स्टेट पावर जनरेशन कंपनी लिमिटेड (CSPGCL) में पदस्थ 39 जूनियर इंजीनियरों ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। इस याचिका में ट्रांसमिशन कंपनी द्वारा जारी उन आदेशों को चुनौती दी गई थी, जिनके माध्यम से सहायक अभियंता (AE) के पद पर पदोन्नति कोटा 70% से घटाकर 40% कर दिया गया था। इसके साथ ही सीधी खुली भर्ती का कोटा 20% से बढ़ाकर 50% और विभागीय भर्ती का कोटा 10% निर्धारित किया गया था। याचिकाकर्ताओं ने इस व्यवस्था के तहत जारी 60 पदों की सीधी भर्ती के विज्ञापन को रद्द करने की गुहार लगाई थी।

    शासन और बिजली कंपनियों का कोर्ट में पक्ष

    मामले की सुनवाई के दौरान शासन और पावर कंपनियों की ओर से पक्ष रखते हुए अधिवक्ताओं ने बताया कि आगामी पावर प्लांट्स और नई परियोजनाओं के तकनीकी संचालन के लिए योग्य ग्रेजुएट इंजीनियरों की अत्यंत आवश्यकता है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के मानकों के अनुरूप ऑल इंडिया ओपन कॉम्पिटिशन के जरिए सीधी भर्ती कराने से संस्थान को अधिक कुशल और प्रशिक्षित इंजीनियर मिल सकेंगे।

    नीतिगत फैसलों में अदालत का हस्तक्षेप नहीं: हाईकोर्ट

    न्यायमूर्ति बिभू दत्ता गुरु की एकल पीठ ने निर्णय सुनाते हुए कहा कि प्रशासनिक अधिकारी और नियोक्ता ही यह तय करने के लिए सबसे उपयुक्त होते हैं कि संयंत्रों व परियोजनाओं के सुचारू संचालन हेतु क्या मानदंड आवश्यक हैं। जब तक कोई नीतिगत निर्णय मनमाना या संविधान के विपरीत न हो, तब तक न्यायालय उसमें दखल नहीं देता।

    पदोन्नति का अवसर अधिकार है, निश्चित कोटा नहीं

    अदालत ने अपने फैसले में दोहराया कि केवल प्रमोशन के अवसरों में बदलाव या कमी होने से किसी कर्मचारी के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं होता। किसी भी लोक सेवक के पास प्रचलित नियमों के तहत पदोन्नति के लिए विचार किए जाने का अधिकार होता है, लेकिन वह किसी निश्चित कोटे को हमेशा बनाए रखने का विधिक दावा नहीं कर सकता।

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