सिंगापुर: एशिया-प्रशांत (एशिया-पैसिफिक) क्षेत्र में भारत की पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियां आने वाले समय में भी मुख्य रूप से पाकिस्तान और चीन के इर्द-गिर्द ही केंद्रित रहेंगी। सिंगापुर में आयोजित होने वाले प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय रक्षा संवाद 'शांगरी-ला डायलॉग' (29 से 31 मई) से ठीक पहले जारी एक वैश्विक रिपोर्ट में यह बड़ा दावा किया गया है। लंदन स्थित मशहूर थिंक टैंक 'इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज' (IISS) द्वारा तैयार की गई 'एशिया-पैसिफिक रीजनल सिक्योरिटी असेसमेंट' (APRSA) रिपोर्ट के मुताबिक, भविष्य में यदि कोई पारंपरिक युद्ध होता भी है, तो उसकी प्रकृति बड़े पैमाने पर न होकर स्थानीय (लोकल) स्तर तक ही सीमित रहेगी।
दो परमाणु संपन्न पड़ोसियों से हाइब्रिड चुनौती
रिपोर्ट में भारत की मौजूदा सुरक्षा स्थिति को 'न युद्ध, न शांति' वाली एक जटिल हाइब्रिड चुनौती के रूप में परिभाषित किया गया है। भारत अपने दोनों परमाणु संपन्न पड़ोसी देशों—चीन और पाकिस्तान—के साथ लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवादों के कारण बड़े पैमाने पर पारंपरिक सैन्य अभियानों के लिए अपनी सेना को लगातार तैयार और आधुनिक कर रहा है। पाकिस्तान के खिलाफ साल 2016, 2019 और हाल ही में 2025 में की गई सैन्य कार्रवाइयों (सर्जिकल स्ट्राइक) से मिले जमीनी अनुभवों ने भारत की सैन्य रणनीति और सिद्धांतों को बदलने और उन्हें और अधिक प्रभावी बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है।
सैन्य रूप से संवेदनशील रहेंगी सीमाएं
IISS की रिपोर्ट के अनुसार, चीन के साथ भारत के सीमा विवाद अपेक्षाकृत पारंपरिक प्रकृति के हैं। चीन सीमा पर तनाव की तीव्रता उतनी अधिक होने की संभावना कम है, जितनी अमूमन भारत-पाकिस्तान संघर्षों के दौरान देखी जाती है। इसके बावजूद, भारत की चीन और पाकिस्तान दोनों के साथ लगने वाली सीमाएं सैन्य रूप से अत्यधिक संवेदनशील बनी रहेंगी। इसके अलावा, हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) से बाहर व्यापक एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भारत द्वारा कोई सक्रिय या आक्रामक सैन्य भूमिका निभाने की संभावना काफी कम है। भारत खुद को ताइवान को लेकर संभावित अमेरिका-चीन संघर्ष से भी पूरी तरह दूर रखने की कोशिश करेगा।
ताइवान और मलक्का जलडमरूमध्य पर भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा
इस वैश्विक रिपोर्ट में अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती सैन्य होड़ का भी विस्तार से विश्लेषण किया गया है। वर्तमान में दोनों महाशक्तियों की रणनीतियों का मुख्य केंद्र ताइवान बना हुआ है; जहां अमेरिका ताइवान की सुरक्षा को मजबूत करने में जुटा है, वहीं चीन किसी भी संभावित अमेरिकी हस्तक्षेप को रोकने की कूटनीति पर काम कर रहा है। इसके साथ ही, हिंद महासागर के प्रमुख और रणनीतिक समुद्री मार्गों, विशेष रूप से मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) को लेकर भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तेजी से बढ़ रही है। क्षेत्र में चीन की बढ़ती नौसैनिक ताकत और सैन्य उपस्थिति के कारण अन्य देशों के बीच भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की रेस तेज हो गई है।


