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    होली के बाद पहले मंगल को काशी में निभाई गई सदियों पुरानी ‘बुढ़वा मंगल’ की महफिल, गंगा घाट पर रात होता है आयोजन

    जब पूरी दुनिया होली से थक जाती है तब होली के बाद पहले मंगलवार को देशभर में कई जगहों पर बुढ़वा मंगल की महफिल सजाई जाती है लेकिन इन सभी जगहों में काशी की होली सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है. बताया जाता है कि यहां यह परंपरा सदियों पुरानी है. आइए जानते हैं किस तरह काशी में बुढ़वा मंगल का होता है आयोजन…

    होली की रंग-बिरंगी खुमारी जब पूरे देश में थम जाती है, तब शिवनगरी काशी में एक और उत्सव 'बुढ़वा मंगल' शुरू होता है. होली के ठीक बाद पड़ने वाले पहले मंगलवार को मनाया जाने वाला यह त्योहार बनारस की सदियों पुरानी परंपरा है. यह सिर्फ होली का समापन नहीं बल्कि प्रेम, सौहार्द, संगीत और बुजुर्गों के सम्मान का अनोखा जश्न है, जिसमें गंगा के घाट रंग, गीत और खुशियों से सराबोर हो उठते हैं. आइए जानते हैं किस तरह काशी में मनाया जाता है बुढ़वा मंगल होली…

     'बुढ़वा मंगल' नाम अपने आप में काशी की संस्कृति का सार है. यह दिन बुजुर्गों को समर्पित है, जहां लोग देवी-देवताओं के साथ ही अपने परिवार और मोहल्ले के वृद्धजनों के चरणों में अबीर-अबीर अर्पित करते हैं. होली के दिन जो मस्ती और हुड़दंग होता है, वही यहां शांति, आशीर्वाद और सम्मान में बदल जाता है. स्थानीय लोग इस दिन नए कपड़े पहनकर घाटों पर पहुंचते हैं, कुल्हड़ में ठंडई और बनारसी मिठाइयों का स्वाद लेते हैं और होली की महफिल में शामिल होते हैं.

     इस परंपरा के बारे में बताते हुए काशी के निवासी प्रभुनाथ त्रिपाठी ने बताया कि होली के बाद बनारसियों पर खुमारी बनी रहती है. मंगलवार को 'बुढ़वा मंगल' के साथ इस मस्ती का समापन होता है. यह सालों पुरानी रीत है, जिसे बनारस आज भी पूरी शिद्दत से निभाता है. इस दिन के बाद गुलाल-अबीर को अगले साल होली तक के लिए रोक दिया जाता है. बुढ़वा मंगल केवल गीत संगीत ही नहीं, बल्कि खान-पान, गुलाल और पहनावे का भी जश्न है.

     बुढ़वा मंगल का मुख्य आकर्षण गंगा के घाट होते हैं. दशाश्वमेध घाट से अस्सी घाट तक सजी हुई बजड़ों (नावों) और घाटों पर लोकगायक और कलाकार अपनी प्रस्तुति देते हैं. इन बजड़ों को फूलों से सजाया जाता है, गद्दे, मसनद और इत्र की खुशबू से महकते ये बजड़े शाम को संगीत की महफिल में बदल जाते हैं. बनारस घराने की होरी, चैती, ठुमरी, बिरहा और कजरी की मधुर धुनें गूंजती हैं.

     एक समय था जब उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की शहनाई, गिरिजा देवी की चैती, पंडित किशन महाराज का तबला और सितार की झंकार रातभर बजती थी. आज भी स्थानीय और आसपास के जिलों के लोकगायक इन घाटों पर मां गंगा और हनुमान जी के चरणों में अपनी कला अर्पित करते हैं. यह महफिल सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि भक्ति और अनोखी परंपरा का संगम है.

     मंगलवार को बनारस के कई घाटों पर इस परंपरा का निर्वहन होता है. दशाश्वमेध घाट से अस्सी घाट तक बुढ़वा मंगल की खुमारी में लोग डूबते उतराते दिखते हैं. गंगा नदी में खड़े बजड़े में लोकगायक अपनी प्रस्तुति देते हैं. इसमें बनारस और आसपास के जिलों के कई लोकगायक और कलाकार शामिल होते हैं. बनारसी घराने की होरी, चैती, ठुमरी से शाम और सुरीली हो उठती है. बुढ़वा मंगल काशी का वह अनोखा रंग है, जहां परंपरा बनारस के अक्खड़पन, फक्कड़पन और आध्यात्मिकता को एक साथ समेटे हुए दिखती है.

     इस दिन देश-विदेश से सैलानी भी काशी पहुंचते हैं. वे गंगा तट पर बिखरे रंग, संगीत और बनारसी जोश का लुत्फ उठाते हैं. घरों में पकवान बनते हैं, दोस्तों-रिश्तेदारों से आखिरी होली मिलन होता है और परिवार के बुजुर्गों को सम्मान दिया जाता है.

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