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    गाजियाबाद में चुनावी खर्च की पारदर्शिता पर सख्त हुआ चुनाव आयोग, 6 राजनीतिक दलों से मांगा हिसाब-किताब

    लखनऊ: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने उत्तर प्रदेश की 127 पंजीकृत राजनीतिक पार्टियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। इनमें गाजियाबाद जिले की कुछ पार्टियां भी शामिल हैं। यह नोटिस 2024 के लोकसभा चुनाव और पिछले तीन वित्तीय वर्षों (2021-22, 2022-23, और 2023-24) के दौरान चुनाव खर्च का ब्योरा न जमा करने के कारण जारी किया गया है। उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) नवदीप रिनवा ने इन दलों से 3 अक्टूबर 2025 तक जवाब मांगा है, अन्यथा आयोग सख्त कार्रवाई कर सकता है, जिसमें पंजीकरण रद्द करना भी शामिल है। इस सूची में गाजियाबाद के भी छह राजनीतिक दलों के नाम हैं। इनमें से कुछ ऐसे हैं जिनका नाम शायद जनता ने सुने भी न हों। ये हैं: बहुजन मुक्ति पार्टी (कौशांबी), भारतीय हिन्द फौज (गोविंदपुरम), भारतीय जन नायक पार्टी (वसुन्धरा), मिहिर सेना (लाल कुआं), पूर्वाचल महापंचायत (इंदिरापुरम) और राष्ट्रीय लोक सर्वाधिकार पार्टी (साहिबाबाद)।

    क्या है मामला?
    चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार, सभी पंजीकृत राजनीतिक दलों को अपने चुनावी खर्च और वित्तीय लेनदेन का हिसाब-किताब समय पर जमा करना अनिवार्य है। हालांकि, उत्तर प्रदेश की 127 राजनीतिक पार्टियों ने पिछले छह वर्षों में न तो लोकसभा और न ही विधानसभा चुनावों में उम्मीदवार उतारे और न ही अपने वित्तीय विवरण आयोग को सौंपे। इनमें से कई पार्टियां गाजियाबाद सहित राज्य के 51 जिलों में पंजीकृत हैं। मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिनवा ने 19 सितंबर 2025 को जारी आदेश में कहा कि इन दलों ने 2019 के बाद से किसी भी चुनाव में हिस्सा नहीं लिया और न ही वित्तीय हिसाब-किताब जमा किया। इस कारण आयोग ने इन पार्टियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगने का फैसला किया। रिनवा ने स्पष्ट किया कि यदि कोई दल इस फैसले से असंतुष्ट है, तो वह 30 दिनों के भीतर नई दिल्ली में चुनाव आयोग के समक्ष अपील कर सकता है।

    गाजियाबाद की पार्टियां भी रडार पर
    गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख जिला है, वहां पंजीकृत कुछ छोटी राजनीतिक पार्टियां भी इस नोटिस के दायरे में आई हैं। स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि गाजियाबाद में कई छोटी पार्टियां पंजीकृत हैं, जो स्थानीय स्तर पर सीमित गतिविधियां चलाती हैं। इनमें से कई पार्टियां केवल कागजों पर सक्रिय हैं और चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लेतीं।

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