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    मौन की शक्ति: श्री श्री रवि शंकर ने बताया चिंता से मुक्ति का अनोखा तरीका

    क्या आपने कभी गौर किया है कि सुबह आंख खुलने से लेकर रात को सोने तक, हम शब्दों के एक मायाजाल में फंसे रहते हैं? हम हर बात का अर्थ खोजते हैं और हर काम में कोई न कोई उद्देश्य, लेकिन इसी भागदौड़ में हम जीवन का वास्तविक आनंद खो देते हैं. आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रवि शंकर कहते हैं कि जिस दिन आपको यह अनुभव होने लगे कि शब्द सीमित और अधूरे हैं, समझ लीजिए कि आपका जीवन गहराई की ओर बढ़ रहा है.

    अक्सर हम मौन से डरते हैं और उसे बातों से भरने की कोशिश करते हैं, जबकि असली संवाद हृदय से और मौन में ही संभव है. चाहे वह प्रेम हो, सुंदरता हो या ईश्वर—इनका सच्चा अनुभव शब्दों के पार जाने पर ही मिलता है. इस लेख में जानिए श्री श्री रवि शंकर के वे विचार, जो आपको चिंता के चक्रव्यूह से बाहर निकालकर ‘स्वयं’ से रूबरू कराएंगे और बताएंगे कि क्यों कभी-कभी एक-दूसरे की भाषा न समझना भी रिश्तों के लिए वरदान साबित हो सकता है.

    शब्द होने लगे सीमित तो जीवन गहराई में

    जब हमें यह अनुभव होने लगता है कि शब्द सीमित हैं, अधूरे हैं,तब समझ लेना चाहिए कि हमारा जीवन गहराई की ओर बढ़ रहा है. तब हम सचमुच जीना शुरू करते हैं. सुबह से रात तक हम शब्दों में जीते हैं – हर बात का अर्थ चाहिए, हर कार्य उद्देश्यपूर्ण होना चाहिए. इस उद्देश्य की दौड़ में हम जीवन का वास्तविक उद्देश्य ही खो बैठते हैं. इस निरंतर उद्देश्य की खोज में हम जीवन का वास्तविक उद्देश्य ही खो बैठते हैं. सामने लटकी गाजर की ओर उछलते खरगोश की भांति – पास होते हुए भी दूर. रात में भी शब्द हमें परेशान करते हैं. वे हमारी गहरी नींद छीन लेते हैं. कई लोग नींद में भी बोलते रहते हैं. शब्दों से मानो कोई मुक्ति ही नहीं. चिंता का मूल कारण भी शब्द ही हैं. बिना शब्दों के क्या आप चिंता कर सकते हैं? दस मिनट चिंता करके देखिए, पर एक भी शब्द का उपयोग न करें – ये संभव ही नहीं! हमारी मित्रता भी शब्दों पर आधारित है. कोई कह दे, “आप बहुत अद्भुत, सुंदर और दयालु हैं,” और हम प्रेम में पड़ जाते हैं. कोई अपशब्द कह दे तो हम आहत और क्रोधित हो जाते हैं. पर प्रशंसा और अपमान, दोनों शब्द ही तो हैं. यदि जीवन शब्दों पर आधारित है, तो वह बहुत सतही है. प्रेम, सच्ची कृतज्ञता, वास्तविक सुंदरता और सच्ची मित्रता, इनका अनुभव शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता.

    शब्द अपर्याप्त हो जाए तो जीवन को गहराई मिलती है

    क्या कभी आप किसी प्रियजन के साथ पूर्ण मौन में बैठे हैं? प्रायः हम उस मौन को भी बातों से भर देते हैं. पिकनिक पर जाते हैं, सुंदर स्थान देखते हैं, पर उसका आनंद लेने के बजाय बोलते ही रहते हैं. कार में चार लोग हों तो चारों एक साथ बोलते हैं. कोई किसी को सुनता नहीं. सब अपनी बारी की प्रतीक्षा में रहते हैं. हमने अपने मन को शोर से भर दिया है. भीतर जितनी अधिक अशांति होती है, बाहर उतना ही ऊंचा संगीत अच्छा लगता है, क्योंकि वह भीतर के शोर को ढक देता है. संगीत में खो जाना आसान है, क्षणिक राहत मिलती है. पर जैसे-जैसे चेतना सूक्ष्म और तनावमुक्त होती है, हम ध्वनि के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं. आज हम शोर के प्रति लगभग असंवेदनशील हो चुके हैं. जब भीतर मौन होता है, तब पक्षियों का गीत और उनके गीतों के बीच का विराम भी मधुर लगता है. बिना किसी वाद्य के वे लय में गाते हैं. यदि हम थोड़ा भीतर जाएँ, तो पाएँगे कि हमारे शरीर में भी दिव्य संगीत चल रहा है,पर हम उससे अनभिज्ञ हैं. जिस दिन हमें अनुभव हो जाए कि शब्द अपर्याप्त हैं, उसी दिन जीवन में गहराई आती है. मित्रों से हमें क्या चाहिए – उनके शब्द या उनकी उपस्थिति? केवल मौन में साथ बैठकर भी आनंद लिया जा सकता है. उपस्थिति स्वयं बोलती है.

    तुम स्वयं प्रेम हो

    प्रेम पर अनेक सेमिनार होते हैं. पर क्या प्रेम वास्तव में जीवन में है? लॉस एंजेलिस की एक महिला प्रेम पर कार्यशालाएँ चलाती थी, पर तीन बार उसका तलाक हो चुका था. मैंने उससे कहा, “अपने साथ बैठो, ध्यान करो, मौन में जाओ और अनुभव करो कि तुम स्वयं प्रेम हो. जब शब्दों से परे जाते हो, प्रेम प्रकट होता है.” जब हम स्वयं प्रेम बन जाते हैं, वह दूसरों तक फैल जाता है. सुंदरता भी ऐसा ही प्रभाव डालती है. उसे देखकर भीतर ऊर्जा का झरना फूट पड़ता है. पर हम उसे अपना बनाना चाहते हैं. जैसे ही हम उसे पाने का प्रयास करते हैं, तो एक और खोज शुरू होती है, एक अंतहीन मृगतृष्णा. और जब उसे पा लेते हैं, तो उसका आकर्षण कम हो जाता है. सुंदरता को पाने की नहीं, उसकी पूजा और समर्पण की आवश्यकता है. जिसे हम समर्पित होते हैं, उसे बाँधना नहीं चाहते. ईश्वर को हमने अक्सर एक वृद्ध पुरुष के रूप में देखा है, पर ईश्वर सदा युवा है. मेरे लिए ईश्वर बहुत चंचल है और आनंदप्रिय है. यह समस्त सृष्टि एक दिव्य खेल है. हमारी चिंताएँ भी उसी खेल का हिस्सा हैं. जीवन एक उत्सव है. आध्यात्मिकता का अर्थ गंभीर चेहरा नहीं है. मौन में ही सुंदरता का सच्चा अनुभव प्रकट होता है. अपने भीतर के प्रेम-स्रोत को जीवित रखने के लिए हमें स्वयं में गहराई तक उतरना होगा.

    सुंदरता हमें ईश्वर की ओर ले जाती है

    एक जर्मन युवक था, जो किसी भी प्रेमिका के साथ तालमेल नहीं बैठा पाता था. वह बहुत बोलता था – प्रश्न स्वयं पूछता और उत्तर भी स्वयं दे देता. कोई उसे सुनना नहीं चाहता था. एक ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ कार्यक्रम में उसकी मुलाकात एक इटैलियन युवती से हुई. न युवती को जर्मन आती थी और न युवक को इटैलियन. दोनों ने विवाह कर लिया और आज भी साथ हैं. मैंने उनसे कहा, “एक-दूसरे की भाषा मत सीखना, ऐसे ही ठीक हो.” जब कुछ कहना होता, शब्दकोश देखना पड़ता. समय लगता, पर संबंध में सांस लेने की जगह मिलती थी. हम मौन में भी गहराई से संवाद कर सकते हैं. हृदय से भी संवाद संभव है. यदि हम अपने भीतर के मौन को नहीं जीते, तो जीवन की बहुत-सी सुंदरता से वंचित रह जाते हैं. प्रतिदिन दस मिनट आकाश को निहारिए. तारों को देखिए. गुलाब को देखिए, पर तुलना मत कीजिए. बस यह अनुभव कीजिए कि वह है और सुंदर है. सुंदरता हमें ईश्वर की ओर ले जाती है, कृतज्ञता की ओर ले जाती है. जब सुंदरता को देखकर भीतर धन्यवाद का भाव उठे, तब समर्पण हो चुका होता हैऔर वहीं से प्रेम का जन्म होता है.

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