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    हर्ष फायरिंग की कीमत: जश्न की गोली ने ली जान, BJP विधायक को मिली सजा

    पटना। बिहार की न्यायिक व्यवस्था में हर्ष फायरिंग (Celebratory Firing) को लेकर आया एक हालिया अदालती फैसला इस समय पूरे राज्य में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। इस ऐतिहासिक निर्णय ने एक बार फिर उस जानलेवा सामाजिक कुप्रथा और प्रशासनिक ढिलाई पर गंभीर बहस छेड़ दी है, जिसे अमूमन लोग अपने तथाकथित 'जश्न' और रसूख का हिस्सा मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। सत्तारूढ़ दल (भाजपा) के विधायक राजू सिंह को एक मांगलिक कार्यक्रम में हर्ष फायरिंग के दौरान हुई एक निर्दोष व्यक्ति की मौत के मामले में विशेष अदालत द्वारा चार वर्ष के सश्रम कारावास और 25 लाख रुपये के भारी-भरकम आर्थिक जुर्माने की सजा सुनाई गई है। यह न्यायिक निर्णय महज एक रसूखदार आरोपी को दंडित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि समूचे समाज और तंत्र के लिए एक स्पष्ट और कड़ा विधिक संदेश है कि आनंद या उत्सव के बहाने देश के कानून को हाथ में लेने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती।

    जश्न की एक आत्मघाती गोली और बेकसूर परिवार के घर में पसरा मातम

    विधिक और सामाजिक समीक्षकों का मानना है कि विवाह, वैवाहिक वर्षगांठ, विजय जुलूस, राजनैतिक रैलियों या चुनावी जीत जैसे किसी भी मांगलिक और उल्लासपूर्ण अवसरों पर अवैध रूप से हवाई फायरिंग करने की सामंती और गैर-कानूनी परंपरा देश के कई हिस्सों में आज भी प्रतिष्ठा का प्रतीक बनी हुई है।

    परंतु, कानून विज्ञान का यह शाश्वत नियम है कि हवा में दागी गई कोई भी अनियंत्रित गोली यह तय नहीं कर सकती कि गुरुत्वाकर्षण के कारण वह वापस धरती पर किस मासूम के सीने पर जाकर गिरेगी। देश में ऐसे अनगिनत बेकसूर परिवार हैं, जिन्होंने दूसरों के क्षणिक और अवांछित जश्न की भारी कीमत अपने अपनों की जिंदगी और अपने घर के चिराग को खोकर चुकाई है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े भी गवाह हैं कि हर साल देश भर में हर्ष फायरिंग के कारण सैकड़ों निर्दोष नागरिकों की अकाल मृत्यु हो जाती है या वे आजीवन दिव्यांगता के शिकार हो जाते हैं।

    संवैधानिक पद और रसूख की ढाल नहीं बनेगी; कानून की नजर में सब बराबर

    इस हाई-प्रोफाइल आपराधिक मामले में एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि और सत्ताधारी दल के विधायक को जेल की सलाखों के पीछे भेजना भारतीय न्यायपालिका की निष्पक्षता और दृढ़ता को साबित करता है। यह स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है कि कानून और संविधान की नजर में किसी भी अपराधी का पद, रसूख, राजनीतिक प्रभाव और सामाजिक कद उसके द्वारा किए गए जघन्य अपराध और उसके विनाशकारी परिणाम से बड़ा नहीं हो सकता।

    अदालत का यह सख्त रुख उन सभी प्रभावशाली लोगों, बाहुबलियों और हथियारों के शौकीनों के लिए एक बड़ा सबक है जो खुलेआम हथियारों का प्रदर्शन (Display of Fire-arms) करने को अपनी झूठी सामाजिक प्रतिष्ठा और रसूख का पैमाना मानते हैं। आपराधिक न्यायशास्त्र का मूल उद्देश्य केवल अपराधी को दंडित करना नहीं, बल्कि समाज में ऐसी त्रासदियों की पुनरावृत्ति को पूरी तरह रोकना और एक भयमुक्त वातावरण का निर्माण करना भी है।

    केवल पुलिसिया डंडे से नहीं, अब समाज को भी बदलनी होगी अपनी रूढ़िवादी सोच

    कानूनी विशेषज्ञों और समाजशास्त्रियों का स्पष्ट मत है कि हर्ष फायरिंग जैसी जानलेवा कुप्रथा पर केवल पुलिसिया मुस्तैदी, प्रशासनिक दिशा-निर्देशों या केवल अदालती फैसलों के डर से शत-प्रतिशत अंकुश नहीं लगाया जा सकता। इसके लिए एक बड़े और व्यापक सामाजिक सुधार तथा जन-जागरूकता अभियान की अत्यंत आवश्यकता है।

    जब तक आम नागरिक और समाज का प्रबुद्ध वर्ग स्वयं इस बात को आत्मसात नहीं करेगा कि उनकी एक पल की लापरवाही और झूठी शान किसी अन्य हंसते-खेलते परिवार की जिंदगी को हमेशा के लिए अंधकार में धकेल सकती है, तब तक ऐसे दर्दनाक हादसों पर पूर्णविराम लगाना असंभव होगा। जश्न का वास्तविक और पवित्र मतलब समाज में खुशियां, उल्लास और सकारात्मकता बांटना है, न कि बारूद के दम पर किसी बेकसूर की जिंदगी छीनना। विधायक राजू सिंह के प्रकरण में न्यायालय द्वारा दिया गया यह सख्त फैसला इसी जिम्मेदार सोच को वैधानिक मजबूती प्रदान करने वाला एक मील का पत्थर माना जा रहा है।

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