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    BJP का गढ़ ढहाने वाले प्रशांत किशोर की कहानी, कैसे बने देश के सबसे चर्चित रणनीतिकार

    पटना| बिहार की हॉट सीट मानी जाने वाली बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के चुनावी परिणाम सामने आ चुके हैं, जिसमें जन सुराज पार्टी (JSP) के संस्थापक प्रशांत किशोर ने शानदार जीत हासिल की है। यह सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन द्वारा राज्यसभा जाने से पहले विधायक पद छोड़ने के कारण खाली हुई थी। बता दें कि इससे पहले नितिन नवीन इस सीट से लगातार पांच बार (चार बार बांकीपुर और एक बार पटना पश्चिम, जो पहले बांकीपुर का ही हिस्सा था) विधायक रह चुके थे। यही नहीं, नितिन के पिता नवीन किशोर सिन्हा भी लगातार चार बार पटना पश्चिम सीट से भाजपा के टिकट पर विजयी रहे थे। इस प्रकार पिछले 31 वर्षों और कुल 9 चुनावों से लगातार अजय रही भाजपा को आखिरकार इस उपचुनाव में हार का सामना करना पड़ा है। गौरतलब है कि वर्ष 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में एक भी सीट न जीत पाने वाली जन सुराज पार्टी ने इस जीत के साथ पहली बार चुनावी सफलता का स्वाद चखा है।

    इस बड़ी राजनीतिक हलचल के बाद हर कोई यह जानना चाहता है कि आखिरकार प्रशांत किशोर कौन हैं, राजनीति में आने से पहले उनका जीवन कैसा रहा, और किस तरह से उन्होंने सियासत के मैदान में कदम रखते हुए भाजपा के इस सबसे मजबूत किले को ध्वस्त कर दिया। आइए जानते हैं उनकी पूरी कहानी…

    कौन हैं प्रशांत किशोर? सियासत में एंट्री से पहले का सफर

    राजनीतिक गलियारों में 'पीके' के नाम से मशहूर प्रशांत किशोर देश के सबसे चर्चित और सफल राजनीतिक सलाहकारों में गिने जाते हैं। उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार साल 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी के सफल और हाई-प्रोफाइल चुनावी अभियान के बाद बड़ी पहचान मिली थी। हालांकि, समय का पहिया ऐसा घूमा कि पर्दे के पीछे रहकर पार्टियों के लिए रणनीति बनाने वाले प्रशांत किशोर ने खुद अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई और अब बांकीपुर के रण में भाजपा के अजेय गढ़ को ढहाने वाले एक प्रमुख राजनेता के रूप में अपनी नई पहचान बना ली है।

    राजनीति में आने से पहले का शुरुआती जीवन और पहचान

    प्रशांत किशोर का जन्म 20 मार्च 1977 को बिहार के रोहतास (सासाराम) जिले के कोनार गांव में हुआ था। उनके पिता श्रीकांत पांडेय एक चिकित्सक थे, जबकि उनकी माता सुशीला पांडेय गृहणी थीं। उनकी शुरुआती स्कूली शिक्षा बक्सर में संपन्न हुई, जिसके बाद की पढ़ाई के लिए वे हैदराबाद चले गए।

    उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में स्नातक (BBA) की डिग्री प्राप्त की और इसके बाद जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी (अमेरिका) तथा हिंदुजा अस्पताल के सहयोग से एएससीआई (ASCI) हैदराबाद से हेल्थकेयर मैनेजमेंट में मास्टर डिग्री हासिल की। उनकी पत्नी जाह्नवी दास असम से ताल्लुक रखने वाली एक डॉक्टर हैं। राजनीति में उतरने से पहले प्रशांत किशोर ने संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा वित्तपोषित सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में पूरे आठ वर्षों तक अपनी सेवाएं दीं। वे अफ्रीकी देश चाड में यूनिसेफ (UNICEF) के सामाजिक नीति और योजना प्रमुख के पद पर कार्यरत रहे और वहाँ संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन के नेतृत्व से भी जुड़े रहे।

    राजनीतिक दुनिया में एंट्री की पूरी कहानी

    • कुपोषण पर बनी रिपोर्ट से खुली सियासत की राह: यूनिसेफ में कार्य करने के दौरान ही प्रशांत किशोर ने वर्ष 2011 में भारत में आर्थिक समृद्धि और कुपोषण के विषय पर एक विस्तृत रिसर्च पेपर तैयार किया था। यह रिपोर्ट तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भेजी गई थी। कहा जाता है कि इसी रिपोर्ट ने सबसे पहले गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का ध्यान अपनी ओर खींचा, जिसके बाद मोदी ने उन्हें मुलाकात के लिए आमंत्रित किया। उस पहली बैठक में प्रशांत किशोर ने अपनी कार्यशैली और विजन से मोदी को इतना प्रभावित किया कि लोकसभा चुनाव की दावेदारी से ठीक पहले उन्हें अपनी कोर टीम में एक राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में शामिल कर लिया गया। यहीं से उनके राजनीतिक सफर की शुरुआत हुई और उन्होंने वर्ष 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव के सफल अभियान में अहम भूमिका निभाई।

    • 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी के लिए संभाला अभियान: साल 2014 के आम चुनाव से पहले प्रशांत किशोर ने 'सिटिजन्स फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस' (CAG) नामक संस्था की सह-स्थापना की। इस संस्था ने भाजपा के लिए 'चाय पे चर्चा' और '3डी रैलियों' जैसे कई बेहद लोकप्रिय और नए दौर के चुनावी अभियान चलाए। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इन रणनीतियों ने 2014 में भाजपा को पूर्ण बहुमत दिलाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई।

    • भाजपा से अलग होकर बने स्वतंत्र रणनीतिकार: वर्ष 2014 के चुनाव के बाद भाजपा संगठन से कुछ मतभेदों के चलते वे पार्टी से अलग हो गए और उन्होंने 'इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी' (I-PAC) की स्थापना की। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। साल 2015 में उन्होंने बिहार में जदयू, राजद और कांग्रेस के महागठबंधन को भाजपा नीत एनडीए के खिलाफ शानदार जीत दिलाई। इसके बाद वे जदयू प्रमुख नीतीश कुमार के बेहद करीबी बन गए। आने वाले वर्षों में उन्होंने आंध्र प्रदेश में वाईएसआरसीपी, दिल्ली में आम आदमी पार्टी (AAP), पश्चिम बंगाल में टीएमसी (TMC) और तमिलनाडु में द्रमुक (DMK) जैसी कई प्रमुख पार्टियों के लिए चुनाव रणनीतियां तैयार कीं और देश के शीर्ष 'किंगमेकर' के रूप में उभरे।

    सक्रिय राजनीति में कैसे हुई प्रशांत किशोर की एंट्री?

    • जदयू से की राजनीतिक पारी की शुरुआत: पर्दे के पीछे रहकर रणनीतियां बनाने के बाद प्रशांत किशोर ने 16 सितंबर 2018 को औपचारिक रूप से सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया और नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल-यूनाइटेड (JDU) की सदस्यता ग्रहण की। पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी, लेकिन यह सफर ज्यादा लंबा नहीं चला। वर्ष 2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के मुद्दे पर नीतीश कुमार से उनके वैचारिक मतभेद हो गए, जिसके बाद उन्हें अनुशासनहीनता का हवाला देते हुए पार्टी से निष्कासित कर दिया गया।

    • चुनावी रणनीतिकार के काम से संन्यास और बिहार वापसी: वर्ष 2021 में पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में अपनी रणनीतियों के दम पर ऐतिहासिक जीत दर्ज कराने के बाद प्रशांत किशोर ने 2 मई 2021 को ऐलान किया कि वह अब पेशेवर चुनाव रणनीतिकार के रूप में कभी काम नहीं करेंगे। उनका कहना था कि कोविड-19 महामारी के दौरान संसाधनों के होने के बावजूद वे आम जनता की वैसी मदद नहीं कर पाए जैसी उम्मीद थी। इस लाचारी ने उन्हें सोचने पर मजबूर किया और बिहार के तथाकथित विकास के खोखले दावों ने उन्हें अंततः अपनी गृहभूमि लौटने के लिए प्रेरित किया।

    • बिहार में खुद की राजनीतिक पार्टी का गठन: बिहार लौटने के बाद प्रशांत किशोर ने किसी अन्य दल में शामिल होने के बजाय सीधे जनता के बीच जाने का फैसला किया। उन्होंने लंबी 'पदयात्रा' निकाली और अंततः अपनी खुद की पार्टी 'जन सुराज पार्टी' की स्थापना कर डाली।

    • बिहार विधानसभा चुनाव और बांकीपुर उपचुनाव की जीत: जन सुराज पार्टी ने 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारे, हालांकि इस चुनाव में पार्टी को कोई खास सफलता नहीं मिली और प्रशांत किशोर ने खुद इस चुनाव से दूरी बनाए रखी थी। इसके बावजूद उन्होंने बिहार में जमीनी स्तर पर अपनी सक्रियता कम नहीं की। हाल ही में जब बांकीपुर सीट खाली हुई, तो उन्होंने इस उपचुनाव में खुद मैदान में उतरने का एलान किया और अंततः भाजपा के इस गढ़ को भेदकर शानदार जीत अपने नाम कर ली।

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