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    सुप्रीम कोर्ट बोला—शादी के बाद भी बेटी अपने परिवार का हिस्सा रहती है

    नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शादीशुदा महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक ऐतिहासिक और बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि शादी के बाद भी एक बेटी का अपने माता-पिता के परिवार से रिश्ता खत्म नहीं होता है और उसे अनुकंपा (कम्पैशनेट) के आधार पर मिलने वाले लाभों से सिर्फ इसलिए वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि वह शादीशुदा है। अदालत ने कहा कि किसी भी सरकारी कल्याणकारी योजना (वेलफेयर स्कीम) का फायदा देने से सिर्फ शादी के आधार पर मना करना पूरी तरह से असंवैधानिक और मनमाना है। यह फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक पुराने आदेश को पूरी तरह पलट दिया।

    संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन

    जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि शादीशुदा बेटियों को कल्याणकारी योजनाओं के दायरे से बाहर रखना, समाज की पुरानी और गलत जेंडर रूढ़िवादिता (स्टीरियोटाइप) पर आधारित है। कोर्ट ने साफ किया कि ऐसा करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद (आर्टिकल) 14 और 15 के तहत देश के हर नागरिक को मिलने वाले बराबरी और भेदभाव न करने के मौलिक अधिकारों की गारंटी का सीधा उल्लंघन है। बेंच के मुताबिक, किसी भी योजना का लाभ देने के लिए असल जरूरत, निर्भरता और पात्रता (एलिजिबिलिटी) को आधार बनाया जाना चाहिए, न कि महिला के शादीशुदा होने या न होने को।

    बेटे और बेटी में भेदभाव की सोच पर प्रहार

    सुप्रीम कोर्ट ने समाज और कानून की इस सोच को गलत बताया कि शादी के बाद बेटी अपने माता-पिता के परिवार की सदस्य नहीं रह जाती या उन पर निर्भर नहीं होती। कोर्ट ने कहा कि शादी कभी भी एक बेटी और उसके माता-पिता के बीच के पारिवारिक रिश्ते को खत्म नहीं कर सकती। बेंच ने इस बात को भी रेखांकित किया कि मौजूदा नियमों में एक शादीशुदा बेटा अपनी शादी के बावजूद हमेशा अपने परिवार का हिस्सा माना जाता है और उसे सारे लाभ मिलते हैं, जबकि बेटियों को सिर्फ उनकी शादी की स्थिति की वजह से इस हक से बाहर कर दिया जाता है, जो कि पूरी तरह गलत है।

    क्या है पूरा मामला?

    यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश की रहने वाली कुलसुम निशा नाम की एक महिला से जुड़ा हुआ है। कुलसुम की मां की मार्च 2024 में मृत्यु हो गई थी, जिसके बाद उन्होंने डिपेंडेंट (आश्रित) कोटे के तहत अपनी मां की 'फेयर प्राइस शॉप' (राशन दुकान) के आवंटन के लिए आवेदन किया था। कुलसुम ने अपनी अपील में बताया था कि वह शादी के बाद भी अपनी मां और बहनों के साथ ही रहती थीं, दुकान चलाने में मां की मदद करती थीं और अब पूरे परिवार का खर्च उठाने की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है। जब प्रशासन ने उनके शादीशुदा होने के कारण दुकान का आवंटन करने से मना कर दिया, तो उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया, जिस पर अब सुप्रीम कोर्ट ने यह बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

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