उत्तराखंड स्थित बागेश्वर का बाबा बागनाथ मंदिर अपनी प्राचीन धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं के लिए हमेशा से मशहूर रहा है. सरयू, गोमती और सरस्वती के संगम के पर स्थित यह मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि यहां निभाई जाने वाली अनोखी परंपराएं भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं. इन्हीं परंपराओं में से एक श्मशान घाट से जुड़ी विशेष मान्यता है, जो आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है. मंदिर समिति के अध्यक्ष नंदन सिंह रावल बताते हैं कि मंदिर के समीप स्थित श्मशान घाट में जब किसी का अंतिम संस्कार यानि शवदाह चल रहा होता है, उस दौरान भगवान शिव को नियमित रूप से चढ़ाए जाने वाले दाल-भात का भोग नहीं लगाया जाता है. यह परंपरा वर्षों पुरानी है, इसे धार्मिक आस्था के साथ जोड़ा जाता है. मंदिर समिति के सदस्यों का कहना है कि भगवान शिव को श्मशानवासी भी कहा जाता है, इसलिए जब आसपास शोक का वातावरण होता है, तब भोग चढ़ाना उचित नहीं माना जाता है.
अगर पूरे दिन श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार होते रहें, तो पूरे दिन मंदिर में भोग नहीं लगाया जाता है. इस दौरान केवल भक्तों के लिए नियमित पूजा-पाठ और आरती की प्रक्रिया जारी रहती है, लेकिन भोजन का प्रसाद अर्पित नहीं किया जाता है. यह परंपरा इस बात का प्रतीक मानी जाती है कि धार्मिक अनुष्ठान भी समय और परिस्थिति के अनुसार संवेदनशीलता के साथ निभाए जाने चाहिए.
हालांकि, धार्मिक नियमों को पूर्ण करने के लिए शाम की आरती या रात के समय विशेष रूप से मिठाई का भोग भगवान शिव को अर्पित किया जाता है. इससे पूजा की परंपरा भी बनी रहती है, दिनभर की धार्मिक मर्यादा का पालन भी हो जाता है. स्थानीय पुजारियों के अनुसार यह संतुलन ही इस परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता है.
गहरी होती श्रद्धा
स्थानीय लोगों का मानना है कि यह अनूठी परंपरा कुमाऊं क्षेत्र की धार्मिक संस्कृति और संवेदनशीलता को दर्शाती है. यहां आने वाले श्रद्धालु जब इस परंपरा के बारे में जानते हैं, तो वे आश्चर्य के साथ-साथ गहरी श्रद्धा भी महसूस करते हैं. यही वजह है कि बागनाथ मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि अपनी विशिष्ट परंपराओं के कारण सांस्कृतिक धरोहर के रूप में भी पहचाना जाता है.


