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    Homeराज्यछत्तीसगढ़3 साल बाद बस्तर में लौटेगा पारंपरिक फिश फेस्टिवल, तैयारियां शुरू

    3 साल बाद बस्तर में लौटेगा पारंपरिक फिश फेस्टिवल, तैयारियां शुरू

    कोंडागांव। छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की समृद्ध जनजातीय संस्कृति और अनूठी परंपराओं का दीदार एक बार फिर होने जा रहा है। कोंडागांव जिले के अंतर्गत आने वाले ग्राम बरकई में तीन वर्षों के लंबे अंतराल के बाद ऐतिहासिक और पारंपरिक ‘बंधा मतौर तालाब उत्सव’ (मछली पकड़ने का त्योहार) का भव्य आयोजन होने जा रहा है। आगामी 23 मई को आयोजित होने वाले इस अनोखे फिश फेस्टिवल को लेकर स्थानीय ग्रामीणों और आयोजन समिति के सदस्यों में जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है। इस रोमांचक लोक उत्सव को देखने और इसमें हाथ आजमाने के लिए न केवल स्थानीय स्तर पर, बल्कि पड़ोसी राज्यों से भी हजारों पर्यटकों और ग्रामीणों के पहुंचने की पूरी संभावना है। गौरतलब है कि साल 2023 में हुए पिछले आयोजन में एक हजार से अधिक लोगों ने शिरकत की थी, जबकि इस वर्ष नया रिकॉर्ड बनने की उम्मीद है।

    सदियों पुरानी ऐतिहासिक विरासत और अलौकिक आकर्षण

    इस उत्सव की सबसे मनमोहक बात इसका सैकड़ों साल पुराना पारंपरिक इतिहास है। उत्सव का शुभारंभ गांव के मालगुजार (पारंपरिक मुखिया) द्वारा तालाब के किनारे की जाने वाली विशेष पूजा-अर्चना और कुलदेवी-देवताओं के आह्वान से होता है। मान्यताओं के अनुसार, जैसे ही बस्तरिया ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज हवा में तैरती है, वैसे ही तालाब के भीतर मौजूद मछलियां पानी की सतह पर आकर उछलने-कूदने लगती हैं। इस अद्भुत नजारे को देखने के बाद वहां मौजूद जनसैलाब एक साथ तालाब के पानी में उतर जाता है और सामूहिक रूप से मछली पकड़ने के अनूठे आनंद में डूब जाता है।

    मालगुजार और पानी से जुड़ी दैवीय मान्यता

    स्थानीय बुजुर्गों और जानकारों के मुताबिक, इस लोक उत्सव के पीछे एक अत्यंत विस्मयकारी मान्यता जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि जब मछली पकड़ने का कार्यक्रम पूरी तरह समाप्त हो जाता है, तब गांव के मालगुजार अपनी उंगली को तालाब के पानी में डुबोते हैं। ऐसा करते ही बची हुई तमाम मछलियां पलक झपकते ही दोबारा गहरे पानी के भीतर ओझल हो जाती हैं। यही रहस्यमयी और अटूट लोक विश्वास इस आयोजन को पूरे बस्तर संभाग में एक विशिष्ट पहचान दिलाता है।

    प्रवेश शुल्क और पारंपरिक औजारों का गणित

    आयोजन समिति के सक्रिय सदस्य मिलन कुमार ने बताया कि इस बार व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए कुछ नियम और शुल्क तय किए गए हैं, जो इस प्रकार हैं:

    • प्रवेश टिकट: उत्सव का हिस्सा बनने और देखने के लिए प्रति व्यक्ति 200 रुपये का प्रवेश शुल्क निर्धारित किया गया है।

    • पारंपरिक उपकरणों का शुल्क: यदि कोई व्यक्ति बस्तर के पारंपरिक मछली पकड़ने वाले औजारों जैसे— जाली, सौकी और चाघोड़ी का इस्तेमाल करना चाहता है, तो उपकरणों के प्रकार के आधार पर अलग से मामूली शुल्क देना होगा।

    • निःशुल्क व्यवस्था: जो ग्रामीण बिना किसी उपकरण के केवल अपने नंगे हाथों से पारंपरिक तरीके से मछली पकड़ेंगे, उनके लिए प्रवेश पूरी तरह निःशुल्क (फ्री) रखा गया है।

    पड़ोसी राज्य ओडिशा के ग्रामीणों को भी आमंत्रण

    आयोजकों ने स्पष्ट किया है कि इस लोक महोत्सव में कोंडागांव जिले के किसी भी ब्लॉक या गांव के नागरिक आकर अपनी किस्मत आजमा सकते हैं। पिछले आयोजन के दौरान सीमावर्ती राज्य ओडिशा से भी सैकड़ों की तादाद में लोग यहाँ पहुँचे थे, जिन्हें इस वर्ष भी विशेष रूप से आमंत्रित किया गया है। तालाब की मेढ़ पर बस्तरिया संस्कृति, लोक धुनों की मिठास, रोमांच और खुशियों का जो ताना-बाना बुनता है, वह इस पूरे दृश्य को एक बड़े लोक मड़ई (मेले) में तब्दील कर देता है। ग्राम बरकई की आयोजन समिति ने समस्त प्रकृति और संस्कृति प्रेमियों से इस दुर्लभ परंपरा का साक्षी बनने की भावभीनी अपील की है।

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