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    वसुंधरा का छलका दर्द कहा- मैं खुद की जमीन नहीं बचा पाई तो दूसरों के लिए क्या लड़ूंगी?

    जयपुर। मुख्यमंत्री न बन पाने की टीस कहीं न कहीं भाजपा की वरिष्ठ नेता वसुंधरा राजे सिंधिया के मन में है। शायद यही वजह है कि एक बार उनका दर्द छलका और उनकी जुबान पर आ गया। उन्होंने झालावाड़ा में जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जब मैं खुद को और अपनी जमीन को नहीं बचा पाई तो आपके लिए क्या लड़ूंगी। उनके इस बयान से राजस्थान से लेकर दिल्ली तक हड़कंप मच गया। बाद में उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि मेरे बयान को तोड़मरोड़कर पेश किया गया है, मेरा मतलब मेरे खुद के अनुभवों से था। 
    दरअसल, सभा में जनता को संबोधित करते हुए राजे ने मुस्कराते हुए कहा था कि जब वे खुद को और अपनी जमीन को नहीं बचा पाईं, तो दूसरों के लिए क्या लड़ सकती हैं। उन्होंने धौलपुर में सड़क निर्माण के दौरान अपनी जमीन चले जाने का उदाहरण देते हुए कहा, मेरा चला गया, मैं नहीं बचा सकी अपने आपको। राजे के इस बयान को राजनीतिक विश्लेषक मुख्यमंत्री पद न मिलने की टीस और पार्टी आलाकमान के प्रति उनके असंतोष के रूप में देख रहे हैं। हालांकि, विवाद बढ़ता देख राजे ने स्पष्टीकरण दिया कि उनके शब्दों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है और उनका तात्पर्य पद से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत अनुभवों से था। इस घटनाक्रम पर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने बीकानेर दौरे के दौरान बेहद सधे हुए लेकिन कड़े अंदाज में प्रतिक्रिया दी। राठौड़ ने ठेठ राजस्थानी (मारवाड़ी) कहावत— “चिट्ठी चूर-चूर करे, मांगे डाल और घी, मोदी सु कुन झगड़ो करे, चिट्ठी खानी नाल” का सहारा लेकर राजे को परोक्ष रूप से नसीहत दी। इस कहावत का अर्थ यह है कि जो कुछ भी प्राप्त हुआ है, उसमें संतोष कर उसका आनंद लेना चाहिए और जिस स्रोत से भरण-पोषण हो रहा है, उससे विवाद मोल लेना आत्मघाती हो सकता है। राठौड़ का यह कटाक्ष स्पष्ट रूप से यह संदेश देता है कि पार्टी में अनुशासन सर्वोपरि है और वर्तमान स्थिति को स्वीकार करना ही श्रेयस्कर है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि राजे आज भी पार्टी की वरिष्ठ नेता हैं और उनके सभी कार्य समय पर हो रहे हैं। लेकिन जानकारों का मानना है कि चुनाव के काफी समय पहले ही इस तरह की बयानबाजी राजस्थान भाजपा में आंतरिक गुटबाजी और नेतृत्व के बीच की खाई को दर्शा रही है, जो आने वाले समय में बड़ी चुनौती बन सकती है।
     

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