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    बिजली कटौती से ग्रामीण परेशान, गांवों में सिर्फ 8 घंटे सप्लाई का दावा

    लखनऊ। उत्तर प्रदेश के कोने-कोने में इन दिनों भीषण बिजली कटौती की वजह से हाहाकार मचा हुआ है। इस समस्या के कारण कहीं पीने के पानी की किल्लत खड़ी हो गई है, तो कहीं छोटे और मझोले उद्योग (लघु उद्योग) पूरी तरह ठप हो गए हैं। इस बदहाली की मुख्य वजह बिना किसी पूर्व सूचना के (अघोषित रोस्टर) की जाने वाली कटौती है। दरअसल, राज्य में उपभोक्ताओं द्वारा स्वीकृत कुल लोड (स्वीकृत भार) और बिजली विभाग के पास उपलब्ध वितरण संसाधनों की क्षमता के बीच एक बड़ा फासला है। अनुमान जताया जा रहा है कि इस चालू माह में बिजली की अधिकतम मांग 33,000 मेगावाट के ऐतिहासिक स्तर को छू सकती है।

    भीषण गर्मी के बीच रात-रात भर जाग रहे लोग

    पूरे प्रदेश में इस समय रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और लू का प्रकोप जारी है। हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि शहरों में बिजली की लगातार हो रही आंख-मिचौली की वजह से लोगों की रातें जागकर कट रही हैं। गुस्से में आकर आम जनता बिजली उपकेंद्रों (पावर सब-स्टेशनों) का घेराव और प्रदर्शन कर रही है। वहीं, ग्रामीण अंचलों की स्थिति और भी दयनीय है, जहाँ कागजों पर तय 18 घंटे की आपूर्ति के मुकाबले जमीनी स्तर पर महज आठ से दस घंटे ही बिजली मिल पा रही है। शासन स्तर पर पर्याप्त बिजली होने के दावों के बीच जब इस भारी कटौती की अंदरूनी वजह तलाशी गई, तो कई बातें सामने आईं।

    इंजीनियरों का खुलासा: सोशल मीडिया ग्रुप पर कोड के जरिए आती है कटौती की कमान

    जब राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में तैनात बिजली अभियंताओं (इंजीनियरों) से इस संकट पर बात की गई, तो चौंकाने वाली हकीकत सामने आई। अधिकारियों का कहना है कि आधिकारिक रोस्टर के मुताबिक शहरी क्षेत्रों को 24 घंटे और ग्रामीण क्षेत्रों को 18 घंटे बिजली देने का नियम है। लेकिन जैसे ही राज्य में लोड बढ़ता है, वैसे ही उच्च स्तर से अघोषित कटौती करने का निर्देश आ जाता है। इसके लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बने विशेष ग्रुप्स में 'सीक्रेट कोड' जारी किए जाते हैं, और उसी कोड के आदेशानुसार स्थानीय स्तर पर बिजली काट दी जाती है।

    दो करोड़ किलोवाट का बड़ा गैप: संसाधनों ने टेके घुटने

    • उपभोक्ता बनाम क्षमता: उत्तर प्रदेश में कुल 3.73 करोड़ बिजली उपभोक्ता हैं, जिनका कुल स्वीकृत लोड 8.57 करोड़ किलोवाट है। इसके विपरीत, पावर कॉरपोरेशन के 132 केवी सब-स्टेशनों की अधिकतम क्षमता सिर्फ 6.25 करोड़ किलोवाट ही है। यानी स्वीकृत लोड और बुनियादी ढांचे की क्षमता में 2 करोड़ किलोवाट से भी ज्यादा का बड़ा अंतर है।

    • ओवरलोडिंग की मार: जब भीषण गर्मी में उपभोक्ता एक साथ एसी, कूलर और अन्य उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं, तो सिस्टम पूरी तरह फेल होने लगता है। इसके अलावा स्वीकृत लोड से अधिक बिजली का उपयोग और करीब 15 प्रतिशत की बिजली चोरी इस संकट को और बढ़ा देती है। अत्यधिक लोड के कारण कहीं मुख्य केबल जल जाती है, तो कहीं बंच कंडक्टर और ट्रांसफार्मर धू-धू कर जल उठते हैं।

    • डिस्कॉम की सीमा: इसी तरह, 33 केवी के स्तर पर बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) की कुल ट्रांसफॉर्मेशन क्षमता 62,123 एमवीए है। पीक आवर्स (जब बिजली की मांग सबसे ज्यादा होती है) में डायवर्सिटी फैक्टर लगभग एक अनुपात एक (1:1) हो जाता है, जिससे ओवरलोड होकर सारे उपकरण जवाब दे देते हैं।

    कटौती का गणित: ग्रामीण इलाकों को ही क्यों बनाया जाता है निशाना?

    एक मुख्य अभियंता ने ग्रामीण क्षेत्रों की सच्चाई बताते हुए कहा कि देहात में 18 घंटे का रोस्टर तय है। मान लीजिए, अगर 'उत्तर प्रदेश लोड डिस्पैच सेंटर' से कोड भेजकर 3 घंटे की कटौती की गई, तो आपूर्ति 15 घंटे बची। इसके बाद अगर देहाती लाइनों में 3 बार लोकल फॉल्ट (स्थानीय खराबी) हुआ और उसे ठीक करने में 3 घंटे लग गए, तो जनता को केवल 12 घंटे ही बिजली मिल पाती है।

    ग्रामीण इलाकों में ज्यादा कटौती इसलिए भी की जाती है क्योंकि वहां शहरी क्षेत्रों की तुलना में विरोध प्रदर्शन या राजनीतिक दबाव कम होता है। साथ ही, गांवों से बिजली बिल का राजस्व (कमाई) भी शहरों के मुकाबले कम आता है, इसलिए लोड कम करने के लिए सबसे पहले ग्रामीण इलाकों को ही चुना जाता है। इसके उलट, शहरों में होने वाली कटौती ज्यादातर स्थानीय तकनीकी खराबियों (लोकल फॉल्ट) के कारण होती है, जिसकी बुनियादी वजह भी कमजोर संसाधन और ओवरलोडिंग ही है।

    व्यवस्था में सुधार के लिए विशेषज्ञों के सुझाव

    बिजली विभाग के अभियंताओं के अनुसार, इन कदमों को उठाकर व्यवस्था सुधारी जा सकती है:

    1. जवाबदेही तय हो: केवल टोल-फ्री नंबर 1912 के भरोसे रहने के बजाय लाइनमैन से लेकर चीफ इंजीनियर (मुख्य अभियंता) तक की सीधे जवाबदेही तय की जाए। स्वीकृत लोड और संसाधनों के अंतर को तुरंत खत्म किया जाए।

    2. कर्मचारियों का निलंबन वापस हो: जिन इंजीनियरों को निलंबित किया गया है, उनका निलंबन रद्द कर उन्हें वापस बिजली आपूर्ति सुचारू करने के काम में लगाया जाए।

    3. संविदा कर्मियों की छंटनी रुके: गर्मी के मौसम को बिजली विभाग के लिए युद्ध स्तर का समय माना जाता है। पहले तबादलों का दौर सर्दियों में होता था, जिससे काम प्रभावित नहीं होता था। ऐसे संकट के समय आउटसोर्सिंग या संविदा कर्मचारियों को काम से हटाना बंद होना चाहिए।

    ऊर्जा मंत्री का दावा: रिकॉर्ड स्तर पर हो रही है बिजली सप्लाई

    इस पूरे मामले पर प्रदेश के ऊर्जा मंत्री एके शर्मा का कहना है कि राज्य सरकार इस भीषण गर्मी में भी बिजली सप्लाई का नया कीर्तिमान बना रही है। पूरे देश में बिजली आपूर्ति के मामले में उत्तर प्रदेश इस समय शीर्ष स्थान पर है और राज्य का अपना बिजली उत्पादन भी लगातार बढ़ रहा है। ऊर्जा विभाग मजबूत बिजली प्रबंधन और बेहतर बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) के जरिए प्रदेश की जनता को निर्बाध बिजली देने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके लिए लगातार नए सब-स्टेशनों का निर्माण, ट्रांसमिशन व वितरण नेटवर्क को मजबूत करने का काम और अधिकारियों द्वारा इसकी निरंतर मॉनिटरिंग की जा रही है।

    मई के महीने में प्रतिदिन बढ़ती मांग के आंकड़े

    उत्तर प्रदेश में मई के महीने में बिजली की खपत लगातार नए रिकॉर्ड बना रही है:

    • 16 मई: 27,776 मेगावाट

    • 17 मई: 28,904 मेगावाट

    • 18 मई: 29,330 मेगावाट

    • 19 मई: 30,160 मेगावाट

    • 20 मई: 30,458 मेगावाट

    • 21 मई: 31,000 मेगावाट

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