चेन्नई। भारत की आजादी के समय देश के ऐतिहासिक और पवित्र राजदंड 'सेंगोल' के निर्माण में अपनी अहम शिल्पकारी और महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रसिद्ध हस्ती वुम्मिदी एथिराजुलु का निधन हो गया है। उनके इस देवलोकगमन पर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर समेत कई गणमान्य व्यक्तियों ने गहरा शोक व्यक्त किया है। उल्लेखनीय है कि उनके ही प्रतिष्ठित परिवार ने आज से 75 वर्ष पूर्व स्वतंत्रता प्राप्ति के समय संसद में स्थापित किए जाने वाले इस ऐतिहासिक सेंगोल को अपने हाथों से गढ़ा था, जो हमारी राष्ट्रीय संस्कृति और सभ्यता का एक अमूल्य प्रतीक बन चुका है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राज्यपाल द्वारा शोक व्यक्त
प्रख्यात शिल्पकार वुम्मिदी एथिराजुलु के निधन पर अपने शोक संदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया के माध्यम से कहा कि उनके जाने से देश ने एक ऐसे महान शिल्पी को खो दिया है जो हमारी गौरवशाली परंपराओं के प्रत्यक्ष प्रतीक थे। वर्ष 2023 में नए संसद भवन के उद्घाटन के अवसर पर प्रधानमंत्री को एथिराजुलु से मिलने और राष्ट्र के प्रति उनके इस अमूल्य योगदान के लिए आभार व्यक्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। इसके साथ ही, तमिलनाडु राजभवन की ओर से जारी आधिकारिक शोक संदेश में राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने कहा कि 1947 में मात्र बीस वर्ष की अल्प आयु में पवित्र सेंगोल के निर्माण में उनका योगदान भारत की सभ्यतागत विरासत और न्यायपूर्ण शासन का कालातीत प्रतीक है, जिसे हमेशा गर्व के साथ याद रखा जाएगा।
पवित्र सेंगोल का ऐतिहासिक महत्व और निर्माण प्रक्रिया
सेंगोल शब्द की उत्पत्ति तमिल भाषा के प्रसिद्ध शब्द 'सेम्मई' से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ धर्म, सच्चाई, निष्ठा और न्याय से होता है। इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो जब भारत की स्वतंत्रता के समय अंग्रेजों से भारतीयों को सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण की बात आई, तब महान स्वतंत्रता सेनानी सी. राजगोपालाचारी (राजाजी) ने प्राचीन चोल राजवंश की परंपरा से प्रेरणा लेते हुए सत्ता परिवर्तन के प्रतीक के रूप में सेंगोल को अपनाने का ऐतिहासिक सुझाव दिया था। इसके पश्चात राजाजी ने तमिलनाडु के तंजौर स्थित प्रतिष्ठित धार्मिक संस्थान 'थिरुववदुथुराई अधीनम' से संपर्क साधा, जिसके मार्गदर्शन और निर्देश पर चेन्नई के प्रसिद्ध जौहरी वुम्मिदी बंगारू चेट्टी के परिवार को इस पवित्र राजदंड के निर्माण का दायित्व सौंपा गया था।
चोल साम्राज्य की परंपरा और आधुनिक संसद में प्रतिष्ठा
प्राचीन चोल साम्राज्य के कालखंड में राजाओं के राज्याभिषेक और सत्ता के एक शासक से दूसरे शासक को हस्तांतरण के समय सेंगोल को अधिकार, संप्रभुता और कर्तव्यपरायणता का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता था। इसी प्राचीन भारतीय परंपरा को पुनर्जीवित करते हुए लगभग पांच फीट लंबे इस स्वर्णमंडित सेंगोल के शीर्ष पर न्याय और निष्पक्षता के प्रतीक 'नंदी' को स्थापित किया गया। इस ऐतिहासिक कृति को तैयार करने वाले वुम्मिदी परिवार के प्रमुख शिल्पकार वुम्मिदी एथिराजुलु और उनके परिजनों की कलात्मक मेहनत ने आज आधुनिक भारत के नए संसद भवन की गरिमा को और अधिक बढ़ाया है, जो देश की सांस्कृतिक विरासत और अटूट अखंडता का चिरकाल तक स्मरण कराता रहेगा।


