सोनभद्र: कभी खूंखार नक्सली आतंक और हिंसा की पहचान रहा उत्तर प्रदेश का अंतिम छोर पर बसा 'बसुहारी' गांव अब पूरी तरह शांत और सुरक्षित हो चुका है। बारूद के साए से बाहर निकलकर यह सीमावर्ती गांव अब चौतरफा विकास और सकारात्मक बदलाव की एक नई कहानी लिख रहा है। गांव में अब बच्चों के पढ़ने के लिए नए स्कूल खुल चुके हैं, आवागमन के लिए पक्की सड़कें बन चुकी हैं तथा घर-घर तक बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंच चुकी हैं।
हालांकि, तमाम विकास कार्यों के बावजूद गांव में आज भी बेहतर सार्वजनिक परिवहन सेवा और मजबूत मोबाइल नेटवर्क का अभाव बना हुआ है। वर्तमान में गांव में केवल कमजोर 2जी नेटवर्क की सुविधा है, जो पूरे क्षेत्र को भी कवर नहीं कर पाता है। इसके अलावा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और इलाज के लिए ग्रामीणों को आज भी करीब 22 किलोमीटर दूर अन्य स्थान पर जाना पड़ता है।
कभी खौफ का पर्याय था बिहार-झारखंड सीमा पर बसा बसुहारी
बिहार और झारखंड की भौगोलिक सीमाओं से सटा यह बसुहारी वही गांव है, जहां कभी हथियारों से लैस नक्सलियों की अंधाधुंध आवाजाही हुआ करती थी और ग्रामीण हर पल खौफ के साए में जीने को मजबूर थे। समय के साथ अब इस गांव के हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। ग्रामीणों के मुरझाए चेहरों पर अब शांति और सुकून का भाव साफ झलकता है। हवाओं में कभी बारूद की दुर्गंध हुआ करती थी, जिसकी जगह अब चहुंओर विकास और बदलाव की बयार महसूस की जा सकती है।
हाल ही में सुरक्षा बलों द्वारा प्रतिबंधित संगठन भाकपा माओवादी के अंतिम पोलित ब्यूरो सदस्य और दो करोड़ रुपये के कुख्यात इनामी नक्सली मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी के बाद जब मीडिया टीम इस दूरदराज सीमावर्ती गांव में पहुंची, तो वहां के लोगों में एक नया उत्साह और सुरक्षा का गहरा भरोसा दिखाई दिया। कभी नक्सली खौफ के कारण मजबूरी में अपना पुश्तैनी गांव छोड़कर जाने वाले लोग भी अब वापस लौटकर काफी आशान्वित नजर आ रहे हैं।
गांव में आए प्रमुख सकारात्मक बदलाव
पक्की कनेक्टिविटी: सोन नदी पर चांची कला से रानीडीह के बीच एक मजबूत पक्के पुल का निर्माण हो चुका है।
सड़क मार्ग: प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तहत गांव के अंतिम छोर तक डामरयुक्त चौड़ी सड़क पहुंच चुकी है।
सुरक्षा प्रबंध: कानून-व्यवस्था और सुरक्षा की दृष्टि से चननी और पोखरिया में दो नई पुलिस चौकियां स्थापित की गई हैं।
शैक्षणिक विकास: गांव में बच्चों की शिक्षा के लिए दो प्राथमिक विद्यालय, एक कंपोजिट विद्यालय और एक राजकीय बालिका हाईस्कूल (सह-शिक्षा) का निर्माण हो चुका है।
पेयजल व बिजली: हर घर तक पाइप लाइन के जरिए शुद्ध पेयजल पहुंचने लगा है और बिजली की आपूर्ति भी नियमित रूप से हो रही है।
बुनियादी सुधारों की दरकार अभी भी बाकी
परिवहन की कमी: गांव में आज भी सुलभ सार्वजनिक यातायात साधनों की भारी कमी है। आवागमन के लिए लोगों को मुख्य रूप से बाइक, साइकिल या अन्य निजी वाहनों पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
कमजोर नेटवर्क: आज के हाई-स्पीड 5जी इंटरनेट के दौर में भी इस गांव में मोबाइल नेटवर्क की बड़ी समस्या है। पुलिस चौकी परिसर में बीएसएनएल (BSNL) का केवल 2जी टॉवर लगा हुआ है, जिसकी क्षमता बहुत कम होने के कारण लोगों को सिर्फ टॉवर के आसपास खड़े होकर ही फोन पर बात करनी पड़ती है।
'विकास कार्यों में देना पड़ता था 10 प्रतिशत हिस्सा'
गांव के पुराने दिनों को याद करते हुए वर्ष 2001 से 2005 तक ग्राम प्रधान रहे बलिराम सिंह खरवार बताते हैं, "उस दौर में क्षेत्र में नक्सली गतिविधियां चरम सीमा पर थीं। गांव के विकास के लिए जो भी सरकारी धन आता था, उसमें से अनिवार्य रूप से 10 प्रतिशत हिस्सा लेवी (पीसी) के रूप में नक्सलियों को थ्रेट देकर देना ही पड़ता था। इसके बाद भी कोई भी विकास कार्य कराना बहुत टेढ़ी खीर था। डर के मारे सरकारी सचिव और अधिकारी गांव आने से हमेशा कतराते थे।"
'नक्सलियों ने फूंक दिया था मकान'
नक्सली प्रताड़ना का शिकार रहे ग्रामीण मुन्ना सिंह बताते हैं, "हमारा परिवार नक्सलियों की ज्यादतियों से सबसे ज्यादा पीड़ित रहा। विरोध करने पर हमारा मकान फूंक दिया गया था और वे हर वक्त हमारे उत्पीड़न की ताक में रहते थे। हालात इतने बदतर थे कि जान बचाने के लिए हमें गांव छोड़कर ज्यादातर समय रॉबर्ट्सगंज में ही शरण लेनी पड़ती थी। जब से क्षेत्र से नक्सलवाद का पूरी तरह सफाया हुआ है, तब से हमने गांव में वापस आकर स्थायी रूप से निवास करना शुरू किया है।"
भौगोलिक स्थिति और पहुंच
कोन ब्लॉक (पूर्व में नगवां) के अंतर्गत आने वाली चननी ग्राम पंचायत कुल चार प्रमुख टोलों—पोखरिया, चननी, अरगुड़ और बसुहारी में बसी हुई है, जिनकी कुल आबादी करीब पांच हजार है। इस गांव से महज एक किलोमीटर की दूरी पर बिहार राज्य की सीमा लगती है, जबकि गांव के ठीक पीछे बहने वाली सोन नदी को पार करते ही झारखंड राज्य शुरू हो जाता है।
भूतकाल में इस गांव तक पहुंचने के लिए लोगों को चांची कला से नाव के सहारे खतरनाक तरीके से सोन नदी पार करके आना-जाना पड़ता था। हालांकि नगवां और पटवध से गांव तक रास्ते जरूर थे, लेकिन वे पूरी तरह कच्चे, पथरीले, पहाड़ी, घुमावदार होने के साथ-साथ बेहद दुरुह और जोखिम भरे थे। भौगोलिक जटिलताओं के इसी नायाब फायदे का लाभ उठाकर नक्सलियों ने इस क्षेत्र को अपना सबसे सुरक्षित गढ़ और ठिकाना बना लिया था, जो अब इतिहास बन चुका है।


