ढाका: बांग्लादेश में इन दिनों पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की जैसे देशों द्वारा प्रस्तावित 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौता' (जिसे इस्लामिक नाटो भी कहा जा रहा है) में शामिल होने को लेकर बहस तेज हो गई है। ढाका के राजशाही विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ प्रो. मो. शरीफुल इस्लाम ने 'रैशनल एक्टर मॉडल' का हवाला देते हुए कहा है कि विदेश नीति के फैसले भावनाओं के बजाय तथ्यों और रणनीतिक विश्लेषण पर आधारित होने चाहिए। उन्होंने इस सैन्य गठबंधन में शामिल न होने के पक्ष में 5 मुख्य कारण दिए हैं:
1. बाहरी सैन्य खतरे का अभाव
प्रो. इस्लाम के अनुसार, किसी भी देश के लिए सैन्य गठबंधन में शामिल होने का मुख्य आधार गंभीर बाहरी खतरा होता है। वर्तमान में बांग्लादेश के सामने ऐसा कोई प्रत्यक्ष सैन्य खतरा नहीं है, जिसके लिए उसे किसी रक्षा समझौते की आवश्यकता पड़े।
2. भारत के साथ अनावश्यक सैन्य टकराव का जोखिम
इस्लामिक नाटो के सिद्धांतों के मुताबिक, एक सदस्य देश पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा। प्रो. इस्लाम सवाल उठाते हैं कि यदि भविष्य में भारत और पाकिस्तान के बीच कोई संघर्ष होता है, तो क्या बांग्लादेश भारत से युद्ध लड़ने का जोखिम लेगा? उनका मानना है कि भारत के साथ पानी, व्यापार और सीमा जैसे अनसुलझे विवादों का समाधान युद्ध से नहीं, बल्कि कूटनीति से ही संभव है।
3. खाड़ी देशों के साथ संबंधों में तनाव की आशंका
यद्यपि सऊदी अरब बांग्लादेशी प्रवासियों के लिए अहम है, लेकिन यूएई, ओमान, कतर और कुवैत जैसे अन्य खाड़ी देश भी बांग्लादेश के आर्थिक हितों के लिए उतने ही जरूरी हैं। इस समझौते के कुछ सदस्य देशों के साथ अन्य खाड़ी देशों के रणनीतिक मतभेद हैं, जिससे बांग्लादेश के अन्य देशों के साथ रिश्ते प्रभावित हो सकते हैं।
4. होर्मुज जलडमरूमध्य और ऊर्जा सुरक्षा पर संकट
होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक व्यापार और बांग्लादेश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यदि इस समझौते के सदस्यों और ईरान के बीच तनाव बढ़ता है, तो ईरान इस मार्ग से बांग्लादेशी जहाजों की आवाजाही रोक सकता है, जिससे बांग्लादेश को बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
5. घरेलू आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं पर असर
बांग्लादेश की मौजूदा आर्थिक स्थिति को देखते हुए देश किसी युद्ध का जोखिम नहीं उठा सकता। भोजन, स्वास्थ्य, आर्थिक और पर्यावरणीय सुरक्षा बांग्लादेश की प्राथमिक जरूरतें हैं। किसी भी सैन्य संघर्ष में उलझने से विकास कार्यों का बजट सैन्य खर्चों की ओर मोड़ना पड़ेगा, जिसका सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा।


