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    Homeधर्म-समाजमृत्यु के बाद या कल्पवास पूर्ण होने पर ही क्यों होता है...

    मृत्यु के बाद या कल्पवास पूर्ण होने पर ही क्यों होता है शय्या दान? जानिए इस रहस्यमयी दान का आध्यात्मिक सच

    Shaiya Daan Meaning: माघ महीने में प्रयागराज का संगम क्षेत्र आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बन जाता है. देश-विदेश से लोग यहां कल्पवास करने पहुंचते हैं. कल्पवास मतलब पूरे महीने नियम से रहना, रोज स्नान करना, पूजा-पाठ, जप, हवन और दान करना. मान्यता है कि इस समय गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर देवताओं का वास होता है, इसलिए यहां किया गया हर सत्कर्म कई गुना फल देता है. कल्पवास में कई तरह के दान किए जाते हैं, लेकिन उनमें से एक खास दान है शय्या दान. बहुत लोग इसका नाम तो सुनते हैं, पर असल में ये क्या होता है, कब किया जाता है और किसे दिया जाता है-ये बात साफ नहीं होती. कुछ लोग इसे मृत्यु से जोड़ते हैं, तो कुछ इसे कल्पवास की पूर्णता से. अगर आप भी इस दान के महत्व और सही नियम समझना चाहते हैं तो इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा.

     

    प्रयाग में कल्पवास के दौरान दान का महत्व
    तीर्थ में दान करना हमेशा से शुभ माना गया है, लेकिन प्रयागराज में माघ महीने के कल्पवास के समय किया गया दान खास माना जाता है. मान्यता है कि यहां किया गया दान कई गुना फल देता है. कल्पवासी पूरे महीने साधारण जीवन जीते हैं-जमीन पर सोना, सादा भोजन, संयम और भक्ति. इसी दौरान वे अपनी क्षमता के अनुसार दान भी करते हैं. आम तौर पर कल्पवास में गाय, घी, तिल, सोना, भूमि, वस्त्र, अन्न, गुड़, चांदी और नमक का दान बताया गया है. इसके अलावा वेणी दान, गुप्त दान और शय्या दान का भी विशेष महत्व माना जाता है. हर दान का अपना अलग उद्देश्य और धार्मिक भाव होता है.

     

    शय्या दान क्या होता है?
    शय्या का मतलब है सोने का बिस्तर-जैसे खाट, पलंग, गद्दा, चादर, तकिया आदि. जब ये चीजें धार्मिक भाव से दान की जाती हैं, उसे शय्या दान कहा जाता है. इसका सीधा भाव है कि दान देने वाला अपने आराम की वस्तु किसी और को समर्पित करता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार यह दान आत्मा की शांति और पुण्य से जुड़ा माना जाता है. इसे त्याग और सेवा का प्रतीक भी समझा जाता है.

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