अवगुणों की पहचान से ही मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है, माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में चातुर्मासिक सत्संग आयोजित
भीलवाड़ा। अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा के पीठाधीश्वर जगद्गुरु आचार्य स्वामी श्री रामदयालजी महाराज ने कहा कि केवल स्वयं को श्रेष्ठ मानना अज्ञान की पराकाष्ठा है। जब तक व्यक्ति अपने भीतर मौजूद अवगुणों को नहीं पहचानता, तब तक उसे मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि मनुष्य अपनी कमियों को छिपाने और दूसरों के दोषों को उजागर करने में अधिक रुचि रखता है, जबकि आत्मकल्याण के लिए आत्मचिंतन और आत्मसुधार आवश्यक है।
गुरुवार को माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में आयोजित “विश्व शांति कल्याण” चातुर्मास के अंतर्गत दैनिक सत्संग में आचार्य श्री ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि स्वयं को श्रेष्ठ समझना गलत नहीं है, लेकिन यह मान लेना कि केवल वही श्रेष्ठ है, अहंकार और अज्ञान का सबसे बड़ा उदाहरण है।
उन्होंने कहा कि जीवन में किसी व्यक्ति का राई के बराबर भी योगदान रहा हो तो उसे पर्वत के समान मानकर उसका सम्मान करना चाहिए। माता-पिता, गुरु, वेद और शास्त्रों में दोष निकालने वाले व्यक्ति को कृतघ्न कहा जाता है।
आचार्य श्री ने कहा कि पशु-पक्षी भी विश्वासघात नहीं करते, लेकिन मनुष्य लालच और स्वार्थ के कारण रिश्तों को भुला देता है। उपकार करने वाले के साथ अपकार करना सबसे बड़ा पाप है। उन्होंने कहा कि प्रकृति के अनुरूप जीवन जीने वाला व्यक्ति ही वास्तव में परमात्मा के निकट पहुंच सकता है।
सत्संग के दौरान अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के संत मनोरथरामजी आलोट ने भी रामचरितमानस पर आधारित प्रवचन दिए। कार्यक्रम के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की आरती की।
इस अवसर पर भीलवाड़ा सहित विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन सुबह 9 बजे से 10 बजे तक सत्संग का आयोजन किया जा रहा है। इसके अलावा सुबह 8:30 बजे से रामधुनी और वाणी पाठ तथा शाम को संध्या आरती और भक्तमाल कथा का आयोजन भी किया जा रहा है।
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