शरदपूर्णिमा महोत्सव में सर्वजातीय सम्मेलन का संदेश, संगठनों को सशक्त बनाने पर जोर
अयोध्या/जयपुर। अयोध्या के रायगंज स्थित दिगम्बर जैन मंदिर, बड़ी मूर्ति परिसर में गणिनीप्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी के 93वें जन्मोत्सव और 75वें संयम दिवस के उपलक्ष्य में त्रिदिवसीय शरदपूर्णिमा महोत्सव का शुभारंभ ध्वजारोहण के साथ हुआ। महोत्सव के पहले दिन दिगम्बर जैन सर्वजातीय सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें देशभर से विभिन्न जातीय संगठनों के प्रतिनिधियों और पदाधिकारियों ने भाग लिया। सम्मेलन में समाज के संगठनों को मजबूत बनाने, सामाजिक एकता बनाए रखने और धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को सामूहिक रूप से आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया।

ध्वजारोहण का सौभाग्य कुलाधिपति सुरेश जैन, मुरादाबाद और प्रकाशचंद बड़जात्या, चेन्नई को प्राप्त हुआ। इसके बाद विधि-विधान से भगवान का अभिषेक और पूजन किया गया। सम्मेलन का मंगलाचरण डॉ. रुचि जैन, दिल्ली ने किया। दीप प्रज्वलन पीठाधीश स्वस्तिश्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी, अरिहंतकीर्ति भट्टारक, भरूच, हसमुख जैन गांधी, इंदौर तथा अमरचंद जैन सर्राफ, लखनऊ सहित अतिथियों ने किया।
संगठनों को सशक्त बनाने का आह्वान
परमपूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने अपने आशीर्वचन में कहा कि प्रत्येक जाति को अपने संगठन को सशक्त बनाना चाहिए। संगठन मजबूत होंगे तो समाज की पहचान और परंपराएं भी सुरक्षित रहेंगी। उन्होंने सामाजिक और धार्मिक कार्यक्रमों को एक मंच से आयोजित करने तथा आपसी एकता को मजबूत करने की आवश्यकता बताई।
माताजी ने प्राचीन आचार्यों के ग्रंथों का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज की पहचान उसके संगठन से भी जुड़ी होती है। उन्होंने सद्गृहस्थ जीवन के साथ सप्तपरमस्थान के चिंतन का संदेश दिया और सामाजिक परंपराओं के संरक्षण पर जोर दिया।
परमपूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी ने सम्मेलन को महत्वपूर्ण पहल बताते हुए कहा कि गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की भावना है कि सभी जातियों के संगठन मजबूत हों और समाज के लोग सामाजिक एवं धार्मिक आयोजनों में एकजुट होकर भाग लें।
चालीस संगठनों के प्रतिनिधियों की भागीदारी
अयोध्या तीर्थक्षेत्र कमेटी के मंत्री विजय कुमार जैन ने बताया कि सम्मेलन में करीब 40 संगठनों के अध्यक्षों और प्रमुखों सहित एक हजार से अधिक लोगों के शामिल होने की जानकारी दी गई। कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों से आए प्रतिनिधियों ने अपने-अपने समाज के इतिहास, वर्तमान स्थिति, संख्या और संगठनात्मक गतिविधियों के बारे में विचार रखे।
अग्रवाल समाज की ओर से रमेश तिजारिया, जयपुर ने समाज के उद्गम और वर्तमान संख्या पर जानकारी दी। खंडेलवाल समाज से प्रकाशचंद बड़जात्या, हुमड़ समाज से विपिन गांधी, बघेरवाल समाज से जैनेन्द्र सावला, जैसवाल समाज से सुबोध जैन, सेतवाल समाज से नितिन नखाते, खरोआ समाज से डॉ. देवेंद्र जैन, पपोरवाड़ समाज से नमिष जैन, वरैया समाज से धर्मचंद जैन, काम्बोज समाज से मिलिंद यम्बल और पद्मावती पुरवाल समाज से मुकेश जैन सहित विभिन्न समाजों के प्रतिनिधियों ने अपने विचार रखे।
सम्मेलन के प्रथम सत्र के समापन पर सर्वजातीय संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष पीठाधीश रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी ने कहा कि प्रत्येक जाति का अपना संगठन और मंच हो, लेकिन व्यापक स्तर पर सभी एकजुट रहें। उन्होंने कहा कि समाज में विविधता के साथ एकता का संदेश देना सर्वजातीय संगठन का प्रमुख उद्देश्य है।
अतिथियों की मौजूदगी में भजन का लोकार्पण
कार्यक्रम में श्री महावीरजी तीर्थ के अध्यक्ष सुधांशू कासलीवाल, जयपुर, राजीव जैन, दिल्ली और प्रोफेसर अनेकांत जैन, दिल्ली सहित अनेक अतिथि मौजूद रहे। मुंबई के प्रसिद्ध फिल्म गायक चिंतन बाकीवाला ने गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी को समर्पित भजन प्रस्तुत किया। इस भजन का लोकार्पण कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों ने किया।
कार्यक्रम का संचालन हसमुख जैन गांधी, इंदौर और डॉ. जीवन प्रकाश जैन ने किया। अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन युवा परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री उदयभान जैन, संयुक्त महामंत्री दिलीप जैन, जयपुर तथा राजस्थान के प्रदेश उपाध्यक्ष धनपाल जैन, उदयपुर सहित देशभर की विभिन्न संस्थाओं के पदाधिकारी भी उपस्थित रहे।
ज्ञानमती माताजी का जीवन धर्म और साहित्य को समर्पित
गणिनीप्रमुख ज्ञानमती माताजी का जन्म उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के टिकैतनगर गांव में शरदपूर्णिमा के दिन हुआ था। उनके माता-पिता लाला छोटेलाल और माता मोहिनी देवी ने बचपन में उनका नाम मैना रखा। बचपन से ही उनकी रुचि धर्म और आध्यात्मिक गतिविधियों में रही। उन्होंने दिगम्बर जैनाचार्य श्री देशभूषण जी महाराज से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण किया और बाद में आचार्य वीरसागर जी महाराज से आर्यिका दीक्षा प्राप्त कर ‘ज्ञानमती’ नाम पाया।
माताजी ने धार्मिक साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, उन्होंने साढ़े पांच सौ से अधिक ग्रंथों की रचना की है। उनके मार्गदर्शन और प्रेरणा से जैन धर्म के अनेक तीर्थों के विकास तथा धार्मिक परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में योगदान रहा है। इनमें हस्तिनापुर स्थित जम्बूद्वीप, महाराष्ट्र के मांगीतुंगी में भगवान ऋषभदेव की विशाल प्रतिमा और अयोध्या के शाश्वत तीर्थ सहित कई तीर्थस्थलों का उल्लेख किया जाता है।
उनके 93वें जन्मोत्सव और 75वें संयम दिवस के अवसर पर जैन समाज की ओर से उनके दीर्घायु होने और निरंतर मार्गदर्शन प्रदान करते रहने की मंगलकामना की गई।
26 अक्टूबर को होंगे धार्मिक आयोजन
अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन युवा परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री उदयभान जैन ने बताया कि 26 अक्टूबर को गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के जन्मोत्सव के अवसर पर भगवान ऋषभदेव की बड़ी प्रतिमा का महामस्तकाभिषेक, धार्मिक अनुष्ठान और सम्मान समर्पण सहित विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
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