ग्रामीणों से संवाद के बिना अरावली संरक्षण पर फैसला न हो, 31 अगस्त की समय सीमा बढ़ाने की अपील
जयपुर। राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने अरावली पर्वतमाला के संरक्षण और सर्वेक्षण के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त हाई पावर्ड कमेटी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए रिपोर्ट जमा करने की निर्धारित समय सीमा बढ़ाने की मांग की है। जूली ने कमेटी को विस्तृत पत्र भेजकर कहा कि अरावली क्षेत्र से जुड़े ग्रामीणों, आदिवासी समुदायों और स्थानीय निवासियों के साथ सार्थक संवाद के बिना कोई अंतिम फैसला नहीं लिया जाना चाहिए।
जूली ने मांग की कि 31 अगस्त 2026 को निर्धारित रिपोर्ट जमा करने की समय सीमा आगे बढ़ाई जाए। उनका कहना है कि राजस्थान सहित दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और गुजरात के सभी अरावली जिलों तथा मथुरा के ब्रज क्षेत्र की पहाड़ियों से जुड़े प्रभावित लोगों की बात सुने जाने के बाद ही रिपोर्ट को अंतिम रूप दिया जाना चाहिए।
कम जिलों के दौरे पर उठाए सवाल
नेता प्रतिपक्ष ने हाई पावर्ड कमेटी के राजस्थान दौरे के सीमित दायरे पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि राजस्थान के बड़े भूभाग में अरावली पर्वतमाला मौजूद है, ऐसे में कमेटी को प्रत्येक संबंधित जिले में जाकर वास्तविक परिस्थितियों का जायजा लेना चाहिए था।
जूली के अनुसार, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की अगुवाई वाली समिति द्वारा अक्टूबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गई अंतरिम रिपोर्ट में राजस्थान के कई महत्वपूर्ण अरावली क्षेत्र शामिल नहीं किए गए। उन्होंने चित्तौड़गढ़, सवाई माधोपुर, भरतपुर, डीग, बूंदी, बारां, झालावाड़, कोटा, करौली और धौलपुर जैसे क्षेत्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन इलाकों को भी विस्तृत अध्ययन के दायरे में लाया जाना चाहिए।
जनसुनवाई में दो मिनट का समय पर्याप्त नहीं
जूली ने कमेटी की जनसुनवाई की प्रक्रिया पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि ग्रामीणों और आदिवासी समुदायों को जनसुनवाई की पर्याप्त जानकारी नहीं मिल पाई, जिसके कारण बड़ी संख्या में लोग अपनी बात रखने से वंचित रह गए।
उन्होंने दावा किया कि जनसुनवाई में प्रतिनिधियों को अपनी बात रखने के लिए महज दो मिनट का समय दिया गया। जूली ने कहा कि अरावली जैसे व्यापक और संवेदनशील विषय पर स्थानीय लोगों की समस्याओं, पर्यावरणीय प्रभावों और आजीविका से जुड़े मुद्दों को समझने के लिए इतना समय पर्याप्त नहीं है।
खनन प्रभावित गांवों का दौरा नहीं करने पर सवाल
नेता प्रतिपक्ष ने खनन और स्टोन क्रशिंग से प्रभावित ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा नहीं किए जाने को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अरावली क्षेत्र में खनन गतिविधियों का स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य, पर्यावरण और आजीविका पर गंभीर असर पड़ता है।
जूली ने कहा कि कमेटी को ऐसे गांवों में जाकर लोगों से सीधे बातचीत करनी चाहिए थी, जहां खनन और स्टोन क्रशिंग का प्रभाव लंबे समय से देखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि धरातलीय स्थिति और प्रभावित समुदायों की वास्तविक समस्याओं को समझे बिना तैयार की गई रिपोर्ट अधूरी रह सकती है।
सभी प्रभावित पक्षों की राय के बाद हो अंतिम फैसला
टीकाराम जूली ने कहा कि अरावली केवल पहाड़ियों की श्रृंखला नहीं है, बल्कि इससे जुड़े क्षेत्रों में बड़ी आबादी की आजीविका, पर्यावरण और भविष्य जुड़ा हुआ है। इसलिए संरक्षण से जुड़े किसी भी निर्णय में स्थानीय निवासियों की राय को महत्व दिया जाना चाहिए।
उन्होंने मांग की कि कमेटी को पर्याप्त समय दिया जाए, सभी संबंधित जिलों का विस्तृत दौरा कराया जाए, खनन प्रभावित गांवों में जनसंवाद किया जाए और ग्रामीणों एवं आदिवासी समुदायों की आपत्तियों व सुझावों को रिकॉर्ड में शामिल किया जाए। इसके बाद ही अरावली संरक्षण और सर्वेक्षण से संबंधित अंतिम निर्णय लिया जाए।
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