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    आरटीआई से खुल सकती हैं कॉलेज की परतें! सूचना आयोग की चेतावनी के बाद कॉलेज पर गंभीर सवाल

    आरटीआई आवेदन पर सूचना नहीं देने का आरोप, राज्य सूचना आयोग ने रिकॉर्ड उपलब्ध कराने के दिए आदेश

    अलवर। बाबू शोभाराम राजकीय कला महाविद्यालय एक बार फिर चर्चा में है। सूचना के अधिकार (आरटीआई) कार्यकर्ता विनोद जाटव ने कॉलेज प्रशासन पर पारदर्शिता की कमी और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े गंभीर आरोप लगाते हुए कई सवाल खड़े किए हैं। मामला राजस्थान राज्य सूचना आयोग तक पहुंच गया है, जहां आयोग ने कॉलेज प्रशासन को रिकॉर्ड उपलब्ध कराने के निर्देश जारी किए हैं।

    विनोद जाटव ने आरोप लगाया कि कॉलेज में वर्षों से विभिन्न व्यवस्थाओं को लेकर छात्र संगठन आंदोलन करते रहे हैं, लेकिन समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं हो सका। उनका कहना है कि सितंबर 2024 में NAAC टीम के निरीक्षण के दौरान व्यवस्थाओं में सुधार किया गया, लेकिन निरीक्षण समाप्त होने के बाद स्थिति फिर पहले जैसी हो गई।

    विकास समिति के खर्चों पर उठे सवाल

    जाटव के अनुसार महाविद्यालय विकास समिति के माध्यम से विद्यार्थियों से जमा कराए गए लाखों रुपये के उपयोग को लेकर कई प्रश्न खड़े हो रहे हैं। इसी संबंध में उन्होंने 2 जनवरी 2026 को सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत आरटीआई आवेदन प्रस्तुत कर वित्तीय वर्ष 2023-24, 2024-25 और 2025-26 के विकास कार्यों, प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वीकृतियों, ऑडिट रिपोर्ट, आयकर रिटर्न और अन्य संबंधित दस्तावेजों की जानकारी मांगी थी।

    उन्होंने आरोप लगाया कि निर्धारित समयावधि में सूचना उपलब्ध नहीं कराई गई। इसके बाद प्रथम अपील भी की गई, लेकिन वहां से भी संतोषजनक जवाब प्राप्त नहीं हुआ।

    मामला पहुंचा सूचना आयोग

    सूचना नहीं मिलने पर मामला राजस्थान राज्य सूचना आयोग पहुंचा। आयोग के समक्ष प्रस्तुत अभिलेखों के अनुसार कॉलेज प्रशासन को नोटिस जारी किया गया था, लेकिन सुनवाई के दौरान न तो प्राचार्य उपस्थित हुए और न ही कोई जवाब प्रस्तुत किया गया।

    राजस्थान राज्य सूचना आयोग ने 1 जून 2026 को पारित आदेश में कॉलेज प्रशासन को चेतावनी देते हुए कहा कि भविष्य में आयोग के नोटिसों का जवाब देना तथा आरटीआई आवेदनों का समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित किया जाए।

    21 दिन में रिकॉर्ड उपलब्ध कराने के निर्देश

    आयोग ने आदेश दिया है कि अपीलकर्ता को 21 दिनों के भीतर संबंधित अभिलेखों का निरीक्षण कराया जाए तथा मांगे गए दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराई जाएं। साथ ही आयोग ने 50 पृष्ठ तक की प्रतियां निःशुल्क उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए हैं।

    पारदर्शिता को लेकर उठे सवाल

    विनोद जाटव ने आशंका जताई है कि यदि रिकॉर्ड में किसी प्रकार की गड़बड़ी है तो उसे छिपाने का प्रयास किया जा सकता है। उनका कहना है कि कॉलेज में हुए कथित वित्तीय मामलों की सच्चाई सामने लाने के लिए वे कानूनी प्रक्रिया के तहत अपनी लड़ाई जारी रखेंगे।

    इस घटनाक्रम ने उच्च शिक्षा संस्थानों में पारदर्शिता, जवाबदेही और सूचना के अधिकार कानून के पालन को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि सूचना आयोग के आदेशों की पालना किस प्रकार की जाती है और मांगी गई सूचनाएं निर्धारित समय में उपलब्ध कराई जाती हैं या नहीं।

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