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    इथेनॉल नीति पर सरकार की घोषणाओं पर उठे सवाल, किसानों को समर्थन मूल्य भी नहीं मिल रहा

    किसानों के मुद्दों पर सरकार को सोचना ही होगा 

    मिशनसच न्यूज, नई  दिल्ली। देश में इथेनॉल मिश्रण को बढ़ावा देने और पेट्रोल आयात में निर्भरता कम करने की सरकारी नीति पर अब गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। दिल्ली में  किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान आरोप लगाया कि “मिथ्या घोषणाओं” के कारण किसानों और उपभोक्ताओं के हित प्रभावित हो रहे हैं, जबकि इथेनॉल उद्योग को बड़ा लाभ मिल रहा है।

    उन्होंने कहा कि भारत में पेट्रोल के साथ इथेनॉल मिश्रण वर्ष 2003 से 2014 तक केवल 1.5% रहा। सरकार बदलने के बाद इसे 5–10% तक बढ़ाया गया। वर्ष 2018 की नीति में 2030 तक मिश्रण का लक्ष्य 20% रखा गया था, लेकिन मार्च 2025 में इसे बढ़ाकर 80:20 अनुपात लागू कर दिया गया।

    उस समय सरकार ने किसानों को “अन्नदाता से ऊर्जादाता” बनाने और उपभोक्ताओं को 55 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल उपलब्ध कराने की घोषणा भी की थी। किसान नेताओं का कहना है कि ये घोषणाएँ “थोथा चना बाजे घना” जैसी साबित हुई हैं, क्योंकि आज तक न किसानों को लाभ मिला और न ही सस्ता पेट्रोल।

    मक्का से इथेनॉल उत्पादन बढ़ा, पर किसान आधे दाम पर बेचने को मजबूर

    इथेनॉल उत्पादन में मक्का की 72% तक की भागीदारी है, लेकिन मक्का उत्पादक किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) भी नहीं मिल पा रहा।

    • अक्टूबर 2025 से अब तक मक्का के दाम अधिकतम 1821 रुपये प्रति क्विंटल रहे।

    • एमपी की नसरुल्लागंज मंडी में दाम केवल 1121 रुपये,

    • राजस्थान की नाहरगढ़ मंडी में 1510 रुपये प्रति क्विंटल रहे।

    • कई गांवों में किसान मक्का 1100 रुपये प्रति क्विंटल तक बेचने को विवश रहे।

    सरकार के अनुमान के अनुसार मक्का की लागत 1952 रुपये प्रति क्विंटल है। MSP की गणना (लागत + 50% लाभ) के अनुसार किसानों को 2828 रुपये प्रति क्विंटल मिलना चाहिए था। यानी किसान प्रति क्विंटल 1700 रुपये से अधिक का घाटा झेल रहे हैं।

    एक दशक में बढ़ा क्षेत्रफल और उत्पादन, पर लाभ नहीं पहुँचा
    • वर्ष 2014-15 में मक्का का क्षेत्रफल 91.9 लाख हेक्टेयर, उत्पादन 241.7 लाख टन था।

    • 2024-25 में यह बढ़कर 120.17 लाख हेक्टेयर और उत्पादन 422.81 लाख टन पहुँचा।

    विशेषज्ञों का कहना है कि यह वृद्धि सरकारी घोषणाओं के कारण हुई, लेकिन किसानों को वास्तविक लाभ नहीं मिला।

    आयात की आशंका से गिरे दाम, वैश्विक दबाव का अनुमान
    भारत का वैश्विक मक्का उत्पादन में हिस्सा 3% है, जबकि अमेरिका का 35%
    विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका के दबाव में यदि भारत में मक्का आयात शुरू हुआ तो स्थिति दाल-तिलहन जैसी हो सकती है और देश आयात-निर्भर बन जाएगा। इसी आशंका से MSP से लगभग 600 रुपये की गिरावट बाजार में देखी गई।
    इथेनॉल उद्योग का विस्तार, भारी लाभ—लेकिन किसान मूल्य से वंचित

    देश में इथेनॉल निर्माण क्षमता 1900 करोड़ लीटर है और 779 से अधिक औद्योगिक इकाइयाँ कार्यरत हैं। वर्ष 2025-26 के लिए:

    • 1048 करोड़ लीटर इथेनॉल की खरीद प्रक्रिया पूरी

    • इसमें 228.52 करोड़ लीटर गन्ने से और

    • 759.75 करोड़ लीटर मक्का आधारित

    सरकार ने इथेनॉल का मूल्य 71.86 रुपये प्रति लीटर तय किया है, जिसके आधार पर मक्का का MSP 2400 रुपये माना गया है।
    लेकिन जब बाजार में मक्का के दाम केवल 1821 रुपये हैं, तो विशेषज्ञों के अनुसार इथेनॉल का दाम 54.52 रुपये प्रति लीटर होना चाहिए।

    किसान नेताओं की मांग—मक्का को भी ‘आवश्यक वस्तु’ घोषित किया जाए

    किसान प्रतिनिधियों ने कहा कि:

    • गन्ने की तरह मक्का को भी आवश्यक वस्तु अधिनियम में शामिल किया जाए।

    • ‘मक्का नियंत्रण आदेश’ लागू कर किसानों को घोषित मूल्य सुनिश्चित किया जाए।

    • चावल से बनने वाले इथेनॉल के लिए भी इसी तरह मूल्य सुरक्षा दी जाए।

    किसान संगठनों का आरोप है कि सरकार “चंदादाताओं को प्राथमिकता दे रही है, अन्नदाताओं को नहीं”, जबकि यह सरकारों का संवैधानिक और नैतिक दायित्व है।

    73:27 मिश्रण की मांग पर आपत्ति

    इथेनॉल निर्माता कंपनियों ने ब्राज़ील की तरह मिश्रण अनुपात 73:27 करने की मांग की है, पर विशेषज्ञों का कहना है कि:

    • ब्राज़ील को इस स्तर तक पहुँचने में 50 वर्ष लगे।

    • वहाँ उपभोक्ताओं को विकल्प दिया जाता है—इथेनॉल रहित पेट्रोल उपलब्ध रहता है।

    • वाहन निर्माता और बीमा कंपनियों को बदलाव से पहले पर्याप्त समय दिया गया था।

    जबकि भारत में अभी ही वाहनों की टूट-फूट, माइलेज में कमी, टायर अलाइनमेंट और प्रदर्शन पर सवाल उठने लगे हैं।

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