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    गंगा दशहरा पर उठा संविधान और गंगा संरक्षण का स्वर

    गंगा दशहरा पर जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने हिमालय, नदियों और पर्यावरण बचाने को बताया संवैधानिक दायित्व

    अलवर। गंगा दशहरा के अवसर पर प्रख्यात जल संरक्षण कार्यकर्ता एवं “जलपुरुष” के नाम से विख्यात राजेंद्र सिंह ने गंगा, हिमालय और संविधान संरक्षण को लेकर महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का नहीं, बल्कि नदियों, पहाड़ों और प्रकृति को बचाने के संवैधानिक दायित्व को याद करने का अवसर भी है।

    उन्होंने कहा कि तरुण भारत संघ के लिए गंगा दशहरा अत्यंत महत्वपूर्ण दिन है, क्योंकि संघ के उपाध्यक्ष रहे स्वर्गीय प्रोफेसर जी.डी. अग्रवाल ने इसी दिन मां गंगा की रक्षा के लिए तपस्या आरंभ की थी। उन्होंने अपने जीवन का बलिदान गंगा के अविरल प्रवाह और हिमालय संरक्षण के लिए दिया।

    राजेंद्र सिंह ने कहा कि प्रोफेसर जी.डी. अग्रवाल की तपस्या के कारण केंद्र सरकार को गंगा पर नए बांधों और हिमालय को नुकसान पहुंचाने वाली परियोजनाओं पर रोक लगाने का निर्णय लेना पड़ा था। लेकिन अब पुनः पुरानी परियोजनाओं को शुरू करने की चर्चाएं चिंता का विषय हैं। उन्होंने कहा कि पहले जिन परियोजनाओं को रोका और रद्द किया जा चुका है, उन्हें दोबारा शुरू करना भी नई परियोजनाओं के समान ही माना जाएगा।

    उन्होंने कहा कि यदि सरकारें और न्यायपालिका संवैधानिक दायित्वों से पीछे हटती हैं तो यह जनता के विश्वास के साथ अन्याय होगा। उन्होंने भारत के संविधान के अनुच्छेद 21, अनुच्छेद 48A और अनुच्छेद 253 का उल्लेख करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है।

    राजेंद्र सिंह ने कहा कि नदियां और पहाड़ सुरक्षित रहेंगे तो देश सुरक्षित, शांतिपूर्ण और समृद्ध रहेगा। उन्होंने कहा कि गंगा दशहरा त्याग, तपस्या और समृद्धि का प्रतीक है। जैसे राजा भगीरथ ने तपस्या से गंगा को धरती पर लाया था, वैसे ही प्रोफेसर जी.डी. अग्रवाल ने गंगा के अविरल प्रवाह को बचाने के लिए संघर्ष किया।

    उन्होंने बताया कि तरुण भारत संघ पिछले 50 वर्षों से वर्षा जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण के क्षेत्र में कार्य कर रहा है। वर्षा जल को धरती में समाहित करने के प्रयासों से जलस्तर बढ़ा, छोटी धाराएं पुनर्जीवित हुईं और वे सदानीरा नदियों के रूप में बहने लगीं।

    उन्होंने कहा कि जब नदियां बहती हैं तभी सभ्यताएं और संस्कृतियां जीवित रहती हैं। इसलिए गंगा दशहरा हमें यह संदेश देता है कि प्रकृति संरक्षण ही मानव जीवन और भविष्य की सुरक्षा का आधार है।

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