
चंडीगढ । संपूर्ण ज्ञान तब मात्र शून्य सिद्ध हो जाता है जब चारित्रिक पतन के कारण व्यक्ति इन्हें व्यवहार में नहीं उतार पाता। कोई कितने भी बड़े विद्यालय-विश्वविद्यालय में पठन-पाठन की श्रेष्ठता की श्रेणी में नि:संदेह गिना जाए, पर यदि वह अपने चरित्र को नहीं संभाल पाता है तो उसकी श्रेष्ठता सामाजिक स्तर पर अमान्य ही होती है। चरित्र का संरक्षण कर साधारण मनुष्यों ने जीवन में बहुत ऊंचाइयां प्राप्त की हैं। स्वामी विवेकानंद चरित्रवान व्यक्ति के रूप में भलीभांति स्थापित हैं। उनकी आध्यात्मिक, दार्शनिक अंतर्²ष्टि से कौन विद्वान परिचित नहीं है। चरित्र में सज्जनता आदि मानवीय गुणों को शामिल किया जाता है। यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि जीवन को सही दिशा में अग्रसर करके वही लोग लक्ष्य को प्राप्त कर पाते हैं, जो जीवनभर सच्चरित्रता की राह पर आगे बढ़ते हैं। चरित्रवान व्यक्ति ज्ञान की श्रेष्ठता प्राप्त करने में सफल रहते हैं। यदि संसार में मानवीय संबंधों में कड़वाहट उत्पन्न हो रही है, तो इसका एक ही सबसे प्रमुख कारण है, वह है चारित्रिक पतन की पराकाष्ठा। यह आकलन करने में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि यदि संपूर्ण मानवजाति चरित्र के मूलमंत्र को अपने जीवन में उतार ले, तो पृथ्वीलोक स्वर्गसमान हो जाएगा। ये शब्द मनीषीसंतमुनिश्रीविनयकुमार जी आलोक ने सैक्टर-18 सी गोयल भवन 1051 मे कहे।
मनीषीश्रीसंत ने आगे कहा जागते केवल वे हैं, जो जीवन को सत्कर्म से संवारते हैं। आसक्ति में जीने वाले व्यक्ति के भीतर विरक्ति के ख्याल आते रहते हैं। जिंदगी धु्रवीय है। विद्युत की तरह वह ़पॉजिटिव है और निगेटिव़ भी। अंधेरा है, तो उजाला भी है। इंसान का सबसे बडा धर्म इंसानानियत को अपनना है बिना इंसानियत के संसार मे एकत्व की भावना जागृत नही हो सकती। अपने धर्म की बात आती है तो इंसान कहता हेै कि मेरा धर्म ही सबसे पवित्र व बडा है और सभी धर्म छोटे है। प्रेम इस जगत का सबसे बहुमूल्य वस्तु है जहां प्रेम है वहां भक्ति है और जहां भक्ति है वहां ईश्वर का वास है। बिन प्रेम से ईश्वर को नही पाया जा सकता। आज इंसान अपने अुनसार ईश्वर की प्रतिमा बनाकर उसे अपने अनुसार ही रिझाने मे लगा है और अपने मुताबिक ही भक्ति कर रहा है। कोई उसे कुछ करने के लिए कहे तो वह इसे अपना अनादर समझता है। भगवान बार-बार कहते हैं कि मैं अपने अनन्य भक्तों के वश में हूं। भगवान केवल स्वार्थ रूपी भक्ति या अच्छे अच्छे भोग लगाने से प्रसंन्न नही होते वो तो इंसान की भक्ति भावना को देखते हैं वह भक्ति भावना के भूखे है।
मनीषीश्रीसंत ने अंत मे फरमाया- आज इंसान को भी सोचना चाहिए कि जेा परमात्मा सारी कायनात का स्वामी है उसे हम किस चीज का भोग लगा सकते हैं जो सारी संगुधित प्रकृति का मालिक है जो सबको रोजी रोटी देने वाला है उसे हम भोग लगाकर ईश्वर का अनादर करते है। भागवत केअनुसार सब जीवों में उपस्थित आत्मा मैं ही हूं। जो मेरे द्वारा बनाए गए प्राणियों का अनादर करते हैं मैं उनसे प्रसन्न नहीं होता और जो प्राणियों की अन्न, जल या औषधि से सहायता करते हैं या सम्मान देते हैं वे उनमें मौजूद मुझे ही प्रदान करते हैं। अत: प्राणियों की सहायता करना और सम्मान देना सबसे श्रेष्ठ सगुण भक्ति है, जो शीघ्र और सुनिश्चित फलदायी है।

