किसी भी परिस्थिति में मन को विचलित नहीं करने वाला ही समताभाव धारक (मुनिराज)
भीलवाड़ा। जीव की पहचान उसके शरीर से होती है। इन्द्रियां अपना-अपना कार्य करती वह एक दूसरे के कार्य में दखल नहीं करती इसलिए उनमें झगड़े नहीं होते है। संसारी इन्द्रियों का पोषण करते है ओर साधु इन्द्रियों की साधना करते है। संत मुनिराज जिनेन्द्र भगवान की आज्ञा से अधिक कुछ नहीं सोचते वहीं संसारी का लक्ष्य होता है किसी भी तरह अपना काम बन जाए। जो जिनेन्द्र की आज्ञा मानते वह मुनिराज होते है ओर जो इन्द्रियों के दास होते है वह संसारी होते है।
ये विचार श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट, मैन सेक्टर शास्त्रीनगर के तत्वावधान में सकल दिगम्बर जैन समाज की ओर से भीलवाड़ा में पहली बार चातुर्मास कर रहे राष्ट्र संत मनोज्ञाचार्य पुलकसागरजी महाराज ने शास्त्रीनगर स्थित सूर्यमहल में गुरूवार को चातुर्मासिक प्रवचन में व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि साधु जिनेन्द्र भगवान के लिए दीक्षा लेता है ओर उनकी आज्ञा में ही चलता है। साधु का लक्ष्य होता है जीवन छूट जाए पर जिनेन्द्र भगवान की आज्ञा नहीं छूटनी चाहिए। वह भगवान की आज्ञा के खिलाफ नहीं जा सकता। वह अपनी इन्द्रियों को विषय भोग में नहीं धर्म ध्यान व साधना में लगाता है।
आचार्यश्री ने कहा कि साधु समता भाव का धारक होता है। वह किसी भी परिस्थिति में खेद खिन्न नहीं होते ओर उनकी मानसिकता अडिग होती है। जो किसी भी परिस्थिति में अपने मन को विचलित नहीं करता वही समता भाव धारण कर सकता है। ऐसे समता भाव वाले मानसिक संतुलन नहीं खोते है। उन्होंने कहा कि जिनकी शक्ति उत्तम सहना होती है वह शुद्धोपयोगी होते है ओर जो उससे कुछ कम सहनशीलता वाले होते वह शुभोपयोगी होते है। हम शुद्धोपयोगी जैसी सहन शक्ति नहीं होने से शुभोपयोगी संत है।
आचार्य पुलकसागर महाराज ने कहा कि शुद्धोपयोगी मुनि आत्मा का ध्यान करते है ओर शुभोपयोगी मुनि धर्म ध्यान करते है। धर्म ध्यान व आत्म ध्यान अलग-अलग होते है जिन्हें एक नहीं माना जा सकता। जो संसारी होता है वह अशुभपयोगी होता है ओर आत्म रोद्र ध्यान करता है।
उन्होंने कहा कि जीवन में सब कुछ कर लेना पर अपने देव, गुरू व शास्त्र पर श्रद्धा कमजोर नहीं करना है। श्रद्धा शरीर से नहीं भाव से जुड़ी होती है। किसी के बहकावे में आकर अपनी श्रद्धा को कभी खराब मत होने देना। शरीर का लुटेरा शरीर लुटता ओर धन का लुटेरा धन लुटता लेकिन श्रद्धा का लुटेरा सब कुछ लूट लेता है। ऐसे लुटेरों से बचकर रहना ही सम्यक दर्शन है।
श्री पुलकसागर चातुर्मास समिति के अध्यक्ष प्रवीण चौधरी ने बताया कि आचार्य पुलकसागर महाराज के सानिध्य में पर्युषण (दशलक्षण) पर्व की साधना 16 से 25 सितम्बर तक सूर्यमहल में होगी। इस अवधि में दस दिवसीय पाप नाशनम शिविर आयोजन को लेकर उत्साह का माहौल है। इस शिविर के लिए अब तक सैकड़ो श्रावक श्राविकाएं पंजीयन करा चुके है।
प्रवचन के शुरू में दीप प्रज्वलन,पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट का सौभाग्य कमलचंद, निवेदिता, चिंतन बड़जात्या परिवार ने प्राप्त किया। चातुर्मास समिति के संयोजक मनीष शाह एवं सह संयोजक लोकेश अजमेरा ने बताया कि प्रतिदिन चातुर्मासिक प्रवचन सुबह 8.30 से 10 बजे तक सूर्यमहल में हो रहे है। शाम 7 से 8 बजे तक आनंद यात्रा एवं आरती का आयोजन किया जा रहा है जिसमें भी शहर के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु शामिल होकर लाभ प्राप्त कर रहे है।
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