
मिसाल बनी पहल : कन्यादान की राशि अधिकतम 100 रुपए
मिशन सच टीम टीकाराम जूली की पहल को केवल एक खबर के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन की चिंगारी के रूप में देखती है। हम टीकाराम जूली के इस प्रयास की सराहना करते हैं और समाज के अन्य वर्गों राजनीतिक, सामाजिक, व्यावसायिक और सांस्कृतिक से आग्रह करते हैं कि वे इस उदाहरण को आगे बढ़ाएँ।
राजेश रवि ,मिशनसच न्यूज, अलवर।
राजस्थान की राजनीति में अपनी स्पष्टवादिता और सामाजिक सरोकारों के लिए पहचाने जाने वाले राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने अपनी बेटी के विवाह पूर्व अलवर के सागर रिसोर्ट में आयोजित कार्यक्रम को एक निजी पारिवारिक समारोह तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने इसे एक ऐसा मंच बना दिया, जहाँ परंपराओं के नाम पर बढ़ती सामाजिक प्रतिस्पर्धा को थामने का साहसिक संदेश दिया गया। यह आयोजन भव्यता में नहीं, बल्कि विचारों की ऊँचाई में विशिष्ट बन गया।
जूली ने अपनी टीम को पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि उनके इस पारिवारिक आयोजन में कन्यादान की राशि अधिकतम एक सौ रुपये ही होगी। न कोई अपवाद, न कोई विशेषाधिकार। गरीब से अमीर, साधारण कार्यकर्ता से लेकर प्रभावशाली नेता तक। सभी के लिए नियम एक समान। यह निर्णय आसान नहीं था, क्योंकि सामाजिक अपेक्षाएँ और वर्षों से चली आ रही परंपराएँ अक्सर व्यक्ति को समझौते के लिए मजबूर कर देती हैं। लेकिन जूली ने यह निर्णय लिया।
विवाह से जुड़े आयोजनों में कन्यादान की परंपरा भारतीय समाज में भावनात्मक और धार्मिक महत्व रखती है। लेकिन समय के साथ यह परंपरा कई बार सामाजिक दिखावे, आर्थिक दबाव और अनावश्यक प्रतिस्पर्धा का रूप ले लेती है। बड़े लिफाफे, भारी-भरकम उपहार और “कितना दिया” की फुसफुसाहटें। इन सबके बीच मूल भावना कहीं खो जाती है।
कार्यक्रम के दिन सागर रिसोर्ट में हजारों लोग उपस्थित थे। अनेक लोग बड़े कन्यादान के लिफाफे लेकर आए थे, उनकी इच्छा थी कि वे अपने सामर्थ्य के अनुसार “कुछ बड़ा” दें। कई लोगों ने आग्रह किया, कुछ ने परंपरा का हवाला दिया, तो कुछ ने सामाजिक प्रतिष्ठा की बात कही। परंतु जूली के निर्देश वाली टीम अपने निर्णय पर अडिग थी। अंततः वही हुआ जो तय था अधिकतम एक सौ रुपया ही स्वीकार किया गया।
यह दृश्य अपने आप में असाधारण था। जहाँ आमतौर पर ऐसे आयोजनों में रकम और उपहार चर्चा का विषय बनते हैं, वहाँ यहाँ विचार और संदेश चर्चा में थे। उपस्थित लोगों ने न केवल इस फैसले को स्वीकार किया, बल्कि खुले दिल से इसकी प्रशंसा भी की। इस पहल ने एक गहरा सामाजिक संदेश दिया। यह संदेश केवल कन्यादान की राशि तक सीमित नहीं था, बल्कि उस सोच को चुनौती देता था जो विवाह जैसे पवित्र संस्कार को आर्थिक प्रदर्शन का माध्यम बना देती है।
टीकाराम जूली का यह निर्णय उनके सार्वजनिक जीवन की उसी सोच का विस्तार है, जिसमें समानता, सामाजिक न्याय और मानवीय संवेदनाएँ केंद्र में रहती हैं। उन्होंने दिखा दिया कि नेतृत्व केवल भाषणों और मंचों तक सीमित नहीं होता, बल्कि निजी जीवन के निर्णयों में भी झलकना चाहिए। जब एक सार्वजनिक जीवन का व्यक्ति अपने घर से समाज को संदेश देता है, तो उसकी गूँज दूर तक जाती है।
इस आयोजन का प्रभाव वहीं समाप्त नहीं हुआ। कई उपस्थित लोगों ने चर्चा की कि वे भविष्य में अपने परिवारों में भी इस तरह की पहल अपनाने का प्रयास करेंगे। कुछ ने कहा कि वे अपने बच्चों के विवाह में कन्यादान या उपहार की कोई बाध्यता नहीं रखेंगे। इस प्रकार, एक व्यक्तिगत निर्णय सामूहिक आत्मचिंतन का कारण बन गया।
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